बोधगया पर प्रयोग में विश्व स्तर पर सिद्धार्थ को मिली सफलता

गया: गया, बिहार और भारत ही नहीं, विश्व आर्किटेक्चर का ख़िताब अपने नाम कर सिद्धार्थ फूले नहीं समा रहे हैं. द इंडिया नेक्स्ट अवार्ड से सम्मानित आर्किटेक्ट सिद्धार्थ के जीवन की  यह बहुत बड़ी सफलता है. इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विश्व को लोहा मनवाने वाले इस सिद्धार्थ ने सुन्दर कलाकृति बोधगया पर अनुसन्धान और कई देशों के अपनाये गए तकनीक के सामने बड़े-बड़े आर्किटेक्चर्स को हैरत में डाल दिया है.
आर्किटेक्ट सिद्धार्थ कुमार दांगी एक साधारण किसान के पुत्र हैं जो गया बोधगया अंतर्गत डोभी प्रखंड के कोसुम्भा गांव के रहने वाले हैं. जिला स्कूल गया से इन्होंने वर्ष 2004 में मैट्रिक, गया कॉलेज गया से वर्ष 2006 में इंटर करने के बाद वर्ष 2012 में एनआईटी पटना से बैचलर ऑफ़ आर्किटेक्चर की डिग्री हासिल की.  इंटर्नशिप गुजरात से करने के बाद मास्टर्स के लिए टॉप टेन यूनिवर्सिटी कैटेलोनिया स्पेन को चुना. वर्ष 2016 में कोर्स पूरा कर हाल ही में इंडिया में आकर तत्काल पटना और चेन्नई में सिद्धार्थ एसोसिएट्स के नाम से ऑफिस का संचालन कर रहे है. इस बीच सिद्धार्थ ने वर्ष 2010 और 2011 में लगातार दो साल बिरला ह्वाईट युवा रत्न अवार्ड, क्रोना टेक फेस्ट अवार्ड, बिल्डिंग तकनीक अवार्ड, वर्ष 2012 में बामियान कल्चरल डिज़ाइन, वर्ष 2016 में हॉस्टल फॉर होप तंजानिया, इंडियन नेशनल वार म्यूजियम डिज़ाइन प्रतियोगिता समेत कई अवार्ड अपने नाम कर चुके हैं.
गत 20 अप्रैल 2017  को  मुंबई में नेरोलैक द्वारा वर्ल्ड बिल्ड ब्रेथिंग सिटी अवार्ड से नवाजा गया. इसके पूर्व दैनिक जागरण पटना द्वारा आयोजित परिचर्चा में सफल भूमिका निभा चुके हैं. आवर गया आवर मिशन पर गया की तमाम समस्याओं पर रेनेन्सास भवन में समस्या और समाधान पर प्रदर्शनी, परिचर्चा और शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके हैं. गया को क्लीन और ग्रीन बनाने के देश के कई इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों के साथ रिसर्च वर्क भी कर चुके हैं. बोधगया के सौंदर्यीकरण एवं वैश्विक सोच पर आधारित सिद्धार्थ के इस डिज़ाइन ने वर्ल्ड आर्किटेक्चर डॉट ओआरजी पर खूब लाइक बटोरी. वास्तुविदों ने इसे विश्वस्तरीय आर्किटेक्चर पत्रिका के लिए चुना और पुरस्कार की भी घोषणा की.
सिद्धार्थ बताते हैं कि स्मार्ट सिटी बोधगया धुंआरहित, साउंडलेस, क्लीन और ग्रीन बने, इसके लिए चार जोन में बाँटकर, बौद्ध मंदिर एरिया को ध्वनि रहित, धुंआरहित, जाम तथा कचरारहित बनाने का प्रयास किया गया है जिससे पूजा—पाठ से श्रद्धालुओं का ध्यान न भटके. यहाँ आने वाले तीर्थयात्रियों की हर समस्या को 1200 मीटर की दूरी में चार भागों में बाँटा गया है. गया और बोधगया में ऑर्गेनिक- इनऑर्गेनिक कचरे को अमेरिका के तर्ज पर आधुनिक कचरा निस्तारण संयंत्र लगाना होगा, सड़कों को अतिक्रमणमुक्त करना होगा. प्राकृतिक सम्पदाओं को सहेजकर सुन्दर बनाया जा सकता है. नदी, तालाब, पहाड़ पर कई संभावित विकल्प हैं. रेन वाटर हार्वेस्टिंग, प्लांटेशन तथा  ट्रान्सपोर्ट की सख्त जरुरत है.
सिद्धार्थ बताते हैं कि मैं बहुत ही गरीबी में पला—बढ़ा, पढ़ने के लिए फी और फॉर्म भरने के लिए पैसे मेरे पिताजी  किसी तरह अनाज बेचकर व्यवस्था करते थे. मैट्रिक परीक्षा के समय ही हुई उनकी आकस्मिक मौत ने पूरे परिवार को सदमे में डाल दिया. अब मेहनत के साथ पढ़ने के सिवा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था. बड़े भैया दांगी प्रेम कुमार विद्यार्थी, माँ सुमित्रा देवी एवं बड़ी बहन बेबी कुमारी ने मेरा हौसला बढ़ाये रखा, जिसके कारण आज मैं इस मुकाम तक पहुंचा हूँ. मेरा सिर्फ एक मूल मन्त्र है, ‘कोई काम नहीं है मुश्किल, अगर किया इरादा पक्का.’

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