डॉ मनीषा सुसाइड मिस्ट्री ने समाज को सोचने पर किया मजबूर, सुसाइड नोट में बताई दिल की बात

जमुई की डा मनीषा सुसाइड मिस्ट्री ने समाज को एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि रिश्तों में पनपी महत्वाकांक्षा व्यक्ति, परिवार व समाज के लिए कतई हितकर नहीं

लाइव सिटीज, जमुई(राजेश कुमार) : जमुई की डा मनीषा सुसाइड मिस्ट्री ने समाज को एक बार फिर से यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि रिश्तों में पनपी महत्वाकांक्षा व्यक्ति, परिवार व समाज के लिए कतई हितकर नहीं. खासकर तब जब बच्चों की उम्र एक खास सीमा को लांघ कर उस स्टेज पर हो जहां से आगे की जिन्दगी उसकी व्यक्तिगत होने वाली हो.

साथ ही अविभावकों के स्वयं का फैसला अपने बच्चों पर थोपना कितना असरकारक होगा या फिर उसके कितने सकारात्मक परिणाम या दुष्परिणाम हो सकते डा मनीषा की सुसाइड इसकी बानगी है. मनीषा जो बात जीते जी अपने परिजनों से कभी न कह पायी उस बात को उसने अपने अंतिम खत में उकेरा है.

माता पिता के नाम लिखे अपने चार पन्ने की चिट्ठी में उसने वो सारी बातें लिखी है जो उसके एकाकीपन और डिप्रेशन का कारण रहा. अपनी मेहनत के बूते वह मुकाम दर मुकाम हासिल करती जा रही थी और उन्मुक्त होकर जिन्दगी जीना चाहती थी लेकिन लोग क्या कहेंगे यह सोंच उसे भीतर से खोखला करती रही.

मनीषा के सुसाइड नोट से ऐसा प्रतीत होता है कि मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उसकी जिन्दगी में ढेरों उतार चढ़ाव आए जिससे वह अंततः हार गई. यहां युवाओं के लिए यह बताना भी लाजिमी होगा कि आत्महत्या जैसे कदम बुजदिली है और जिन्दगी की जंग में उतार चढ़ाव आते रहते हैं जिनसे मुकाबला करना ही असल जिन्दगी है. जिन्दगी में स्वतंत्रता बेहद जरूरी है लेकिन स्वछन्द होकर आत्मघाती कदम उठाना कायराना हरकत कहलाता है.

बीते दिनों बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित ओल्ड मेडिकल हाॅस्टल में घटी खुदकुशी की इस घटना के बाद भले ही जमुई की इस प्रतिभावान युवा महिला डाक्टर की आत्महत्या को मिस्ट्री माना जा रहा हो परन्तु डा मनीषा का सुसाइड नोट सारी कहानी बयां कर रहा है. अपने चार पेज के इस नोट में डा मनीषा ने इशारों में वो सारी बातें लिख डाली है जो उसे विगत कई दिनों से कचोट रही थी या जिसकी वजह से वह परेशान थी.

घटना बड़ी है और इस घटना ने एक साथ कितने सपनें तोड़े हैं यह डा मनीषा के सुसाइड नोट से करीब करीब स्पष्ट सा दिखता है. जमुई के एक साधारण से व्यवसायी परिवार में जन्मी और पली बढ़ी मनीषा अपने दो भाई बहन में बड़ी थी.

इसे भी पढ़ें : जमुई: डॉ. मनीषा ने काशी हिंदू विवि के ओल्ड मेडिकल हॉस्टल कर ली खुदकशी, परिवार में छाया मातम

जमुई के मुख्य बाजार महाराजगंज में उसके पिता अनिल केसरी का पैतृक आवास है जहां अपने छोटे भाई सुनील केसरी के साथ वे ड्राय फ्रूट्स का छोटा सा दुकान भी चलाते हैं. मनीषा बचपन से ही होनहार थी और पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहती थी मैट्रिक और इंटर उसने जमुई से कि थी.

कुछ समय वह कोटा में रही और फिर उसने मेडिकल में प्रवेश पा लिया. समाज व परिवार के लिए उसकी यह उपलब्धि काबिले तारीफ थी जिसकी प्रशंसा करते यहां के लोग थकते नहीं थे. फिर वो घड़ी भी आई जिसका इंतजार हर माता-पिता को रहता है. मनीषा ने अपने कैरियर का ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया था और अब वह मनीषा से डा मनीषा बन चुकी थी.

मनीषा द्वारा उसके मम्मी पापा के नाम लिखे अंतिम खत पर यकीन करें तो यहीं से डा मनीषा के भीतर एक द्वंद उपजा जिसने उसके जीने की लालसा को लगभग डवांडोल कर दिया. डा मनीषा अब इस दुनिया में नहीं है पर उसने अपने अंतिम खत के जरिए दुनियां को जता दिया है कि स्वर्णिम कैरियर के लिए छोटे जगहों से अकेली निकली युवतियों की राहें आसान नहीं होती.

उन्हें परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए.  डा मनीषा तो स्वयं जिन्दगी की जंग जरूर हार गई पर जाते जाते उसने एक मेसेज दिया है कि अपनों का थोड़ा समर्थन मिले तो बड़ी से बड़ी लड़ाई ऊंचे मनोबल के साथ लड़ी जा सकती है.

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*