मुख्यमंत्री जी जरा देखिए.. घास खाकर जीने को विवश हैं यहां के लोग..

जमुई : ये खबर है खैरा प्रखंड क्षेत्र के अरूणमाबांक पंचायत स्थित चितरवार नैयाडीह गांव की. गांव की बुजुर्ग महिला सितीया देवी अपने तीन पोतों के साथ खाना खा रही थी. खाने की थाली देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं. सितीया की थाली में चावल के साथ उबले घांस का साग था. जिसे सितीया व उसके पोते लाचारी वश खा रहे थे. सितीया के खाने की यह थाली एक दिन की बात नहीं है. दरअसल खाना की यही थाली अब उनकी दिनचर्या बन चुकी है और घास को वहां की अगली पीढी भी मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर चुकी है. इनका अच्छा समय आलू की बुआई के बाद आता है तब यहां के लोग चावल के साथ आलू के पत्ते की साग और फिर आलू उखड़ने पर दो माह तक आलू खाते हैं.

बाकी के दस महीने सरकारी चावल के साथ घास का साग ही यहां का मुख्य आहार है. लाचारी है.. गरीबी की पराकाष्ठा यह है कि इनकी कमाई का मुख्य पेशा जंगलों से दतमन लाकर बेचना है जिससे इन्हें बमुश्किल रोजाना 25 से 30 रूपये की कमाई हो जाती है. और इसी कमाई से इन लोगों को अपने साथ साथ अपने बच्चों का भी पेट पालना होता है.

‘पीने का पानी’ सोच कर अभी से ही यहां के बाशिन्दों के रोंगटे खड़े हो रहे हैं. कारण यह है कि मौजूदा वक्त में गांव में दो कुंआ है जो अप्रैल माह बीतते बीतते सुख जाता है और गांव वालों को गांव से चार पांच किलोमीटर दूर दुसरे गांव चितरवार के उपरी टोला से पानी लाना पड़ता है. जिसमें इन्हें दो से तीन घंटे लग जाते हैं. मोटे तौर पर सात निश्चय योजना के सरकारी दावों से उलट इस गांव की हकिकत काफी भयावह है. पचास घरों की आबादी वाले इस गांव में रोटी कपड़ा और मकान आज भी दिवास्वप्न है.

शिक्षा स्वास्थ्य और विकास की तमाम योजनांए यहां जिंदगी की जीने की जंग में पिछड़ती चली जा रही है. इनको न कोई देखने वाला है न ही सुनने वाला. शिक्षा और स्वास्थ्य की बात तो आप सोंच ही नही सकते. एक सरकारी स्कूल तो है लेकिन वो भी सिर्फ दिखावे का. पिछले ठंढ में यहीं के तीन लोग ठंढ से मरे थे जिसके बाद यह गांव चर्चा में आया था. खूब हाय तौबा मची थी. बताया जाता है कि उचित खानपान और इलाज के अभाव में वे तीनों जानलेवा टीवी रोग से भी पीढीत भी थे.

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