अगर सही समय पर होती पहल तो बच सकती थी ‘वो’ !

पटना : बिहार में सोस के नाम से मशहुर डॉल्फिन का पौराणिक, ऐतिहासिक व वैज्ञानिक महत्व भी रहा है. पौराणिक महत्व के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जब गंगा धरती पर अवतरित हो रही थी तो सोस यानि डॉल्फिन गंगा के आगे-आगे चल रही थी. वहीं ऐतहासिक महत्व की बात करें तो बाबरनामा में भी डॉल्फिन की चर्चा है. जबकि वैज्ञानिक रूप से डॉल्फिन की महत्ता बहुत अधिक है. इनके संरक्षण से हमारी नदियां संरक्षित होगी, जो हमारे पृथ्वी और पर्यावरण के लिए हीतकर है. एक रिसर्च के मुताबि डॉलफिन्स नदियों के जल को शुद्ध करने का भी काम करती हैं.

इन्हीं कारणों से डॉलफिन की सुरक्षा को लेकर सरकार ने कड़े कानून भी बना रखे हैं. गंगा नदी में पाए जाने वाले डॉलफिन की घटती संख्या को लाकर सरकार और कई अन्य संस्थाएं काम भी कर रही हैं. लेकिन, इन सबके बाबजूद भी पटना में गंगा के दीघा घाट के पास जिला प्रशासन और वन्य विभाग की लापरवाहियों की वजह से एक डॉलफिन जिंदगी की जंग हार जाती है. जी हां, रविवार की शाम दीघा घाट के किनारे एक डॉलफिन सही समय पर मदद नहीं मिलाने के कारण मौत के मुहं में समा जाती है. तत्काल मदद नहीं मिलने के कारण गंगा की धारा उस मरे हुए डॉलफिन को बहा ले गई.

और उसकी सांसे चलनी बंद हो गयी 

दरअसल पटना के दीघा घाट पर रविवार की शाम करीब 4 बजे बेहोशी की हालत में एक डॉलफिन नजर आती है. उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि घायल है. घाट पर मौजूद स्थानीय लोगों की नजर जैसे ही उस पर पड़ी वे दौड़े-दौड़े घाट के किनारे गए. एक स्थानीय युवक के अनुसार उस वक्त उस डॉलफिन की सांसे चल रही रही थी. हालांकि उसे देखकर साफ प्रतीत हो रहा था कि वह अस्वस्थ है. घाट पर मौजूद लोगों ने कहा कि हमने आनन-फानन में दीघा थाना में फ़ोन किया गया लेकिन वहां किसी ने फ़ोन नहीं उठाया. फिर हमने डायल 100 पर भी फोन किया. इस नंबर पर फ़ोन तो उठाया गया लेकिन, फ़ोन पर जो अधिकारी थे उन्होंने हमारी बात ठीक से सुनने के बजाय फ़ोन काट दिया.  इसके बाद हमने मछुआरों से मदद की गुहार लगायी लेकिन वे नदी किनारे पर गहराई की बात कह आगे बढ़ गए और हमारी मदद नहीं की. स्थनीय लोगों ने आगे कहा कि हमने अपने स्तर से किसी तरह डॉलफिन को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन, किनारे पर गहराई ज्यादा थी और अंधेरा हो रहा था. इसलिए हम कुछ नहीं कर पाएं और वह डॉलफिन मर गयी. उसकी सांसें चलनी बंद हो गयी थी. आगे हम कुछ समझते कि डॉलफिन धीरे-धीरे गंगा की धारा में बह गई.

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घाटों पर क्यों नहीं है वन विभाग का नंबर
स्थानीय लोगों ने कहा कि अगर घाट के नजदीक कहीं भी वन विभाग के अधिकारियों का नंबर होता तो शायद हम उस डॉलफिन की जान बचा लेते. लेकिन प्रशानस ने घाट के आस- पास कहीं भी नंबर नहीं प्रसारित किया है. खासकर तब जब सबको मालूम है कि पटना के गंगा नदीं में डॉलफिन्स पाई जाती हैं. कई बार डॉलफिन मछुआरे का भी शिकार हो जाती है, लेकिन हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते हैं. लोगों का कहना है कि पुलिस को फोन करने के बाद कई बार हमें कोई सहायता नहीं मिलती है या सहायता मिलने में काफी देर हो जाती है. वहीं दीघा थाना प्रभारी ने बताया कि हमे इस संबंध में कोई फ़ोन नहीं आया. अगर आता तो हम जरूर जाते.

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