ट्रिपल तलाक मामला संविधान पीठ को हस्तांतरित

लाइव सिटीज डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ट्रिपल तलाक और मुस्लिम समुदाय में बहुपत्नी के संवैधानिक वैधता पर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है. चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर ने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि इस मामले में सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ही सुनवाई होगी. हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि यह मामला न केवल गंभीर बल्कि बेहद संवेदनशील है, इसलिए अदालत को इसे सुनना चाहिए.

बता दें कि कई महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय के पटल पर एक याचिका दायर की है जो ट्रिपल तलाक के चलन को रद्द करने की मांग करता है, अर्थात इसकी वैधता को चुनौती देता है और इसे अवैधानिक घोषित करने की मांग करता है. हालांकि, अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस चलन का बचाव किया था और कहा था कि धर्म प्रदत्त अधिकारों को अदालत में नहीं घसीटा जा सकता है और इस संबंध में कोई पूछताछ नहीं की जा सकती है. साथ ही यह भी कि एक महिला को मार देने से बेहतर होगा कि उसे तलाक दे दें. यानि किसी की मौत से तो तलाक बेहतर ही है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दावा किया है कि ट्रिपल तलाक के खिलाफ किसी भी आदेश का पालन करना मुस्लिमों के धर्मिक अधिकार का एक उल्लंघन होगा.

तस्वीर प्रतीकात्मक है

सर्वोच्च न्यायालय में ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध लगाने की मांग संबंधी कई मामलों के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है. इसी एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है और मामले को पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ को हस्तांतरित कर दिया है जो ट्रिपल तलाक सहित निकाह हलाला और बहु—पत्नीविवाह जैसी प्रथाओं की संविधान के दायरे में समीक्षा करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई से लगातार चार दिनों तक इसपर सुनवाई के लिए दिन निर्धारित किए गए हैं और संबंधित पक्षों से कहा है कि अगर उन्हें कुछ कहना है तो अटॉर्नी जनरल के पास अपनी बातें लिखित में उपलब्ध करा दें. वे बातें माननीय न्यायधीश के समक्ष विचारार्थ रखी जाएंगी. आपको बता दें कि केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में चार अहम बिंदु विचारार्थ रखे गए हैं.

तस्वीर प्रतीकात्मक है

पहला, क्या तलाक, हलाला और बहु—विवाह संविधानप्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत अनुमति है? दूसरा, सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने के अधिकार और समानता के अधिकार में तवज्जो किसे दी जाए? तीसरा, मुस्लिम पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 13 के कानून की मान्यता दी जाएगी? और चौथा, क्या ट्रिपल तलाक, हलाला और बहु विवाह उन इंटरनेशन लॉ के तहत विधि सम्मत हैं जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं?

गौरतलब है कि दुनिया के 21 देशों में, जो मुस्लिम बहुल भी हैं, में ट्रिपल तलाक प्रतिबंधित है. इराक, इंडोनेशिया, टर्की, बांग्लादेश, श्रीलंका, ट्यूनेशिया, मिश्र और पाकिस्तान इनमें प्रमुख हैं. भारत में भी इसे प्रतिबंधित करने की मांग उठती रही है और मुस्लिम समाज से भी ऐसी मांगे उठती रही हैं लेकिन सियासी दांवपेंच में यह मामला अब तक अटकता रहा है.  पीठ ने  कहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए छुट्टी के दिनों अर्थात शनिवार और रविवार को भी इसपर चर्चा को तैयार हैं.

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