धड़ल्ले से बनती-बिकती शराब, बस दाम थोड़ा ज्यादा

पटना: राज्‍य सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाये जाने के बाद भी पटना और उसके आस-पास के इलाकों में अवैध शराब बनाने और बेचने का काम जारी है. इसके साथ ही अंग्रेजी शराब भी अब पटना और उसके आस-पास ऑन डिमांड घर-घर पहुंचाया जा रहा है. फर्क केवल इतना है कि कीमत बढ़ गई हैं और सयम बदल गया है.

राजधानी के जानीपुर वीरनचक में अवैध शराब का धंधा चल रहा है. यहां शराब निमार्ण का कार्य रात दस बजे से शुरू हो जाता है. बेचने का काम सुबह पांच बजे से सात बजे तक उसके बाद सब कुछ साफ. खुदरा नहीं होल सेल में शराब बेची जाती है. लोग उसे ले जा कर छूपकर बेचते हैं. फर्क यह हैं कि पहले इसकी कीमत जो थी अब नई कीमत तीन गुना बढ गई हैं. इसके साथ ही जानीपुर, मसौढी, गौरीचक में भी शराब निमार्ण कर उसका थोक कारोबार हो रहा है. पुनपुन बड़ा बाजार है. जहां नदी के आर में आराम से शराब बनाने का कार्य होता है.

अंग्रेजी शराब तो ऑन डिमांड उपलब्‍ध है. इस धंधे में कोई कमजोर घर के लोग नहीं है. कई पुलिस पदाधिकारी के पूत्र अधिकारियों के पूत्र शामिल हैं. ऑन डिमांड पर शराब आराम से वाहन में लग कर घर घर पहुंचाया जाता है. चार बोतल से कम नहीं अधिक बोतलनें की मांग हुई तो पीली बत्‍ती लगी कार से शराब आराम से आप के बताये स्‍थल तक पहुंचा दिया जाता है. शर्त एक ही होती हैं ग्राहक पहचान के होने चाहिए या उनकी गारंटी पहचान वाले उठायें. पुलिस कॉलोनी के कई युवा वर्ग के लोग इस धंधे में लगे हैं जो पुलिस पदाधिकारी के लड़के हैं. इसके सा‍थ ही बेउर में भी शराब ऑन डिमांड उपलब्‍ध है.

बाई पास और कंकडबाग में भी शराब ऑन डिमांड उपलब्‍ध है. पुलिस पदाधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि शराब बेची जा रही है. पीने वालों को आज भी शराब मिल जाती हैं मगर सरेआम नहीं मिलती और अब औकात वाले की शराब पी रहे है. चितकोहरा पूल पर प्रति दिन शराब के नशे में लोग गिरे मिलते हैं. मगर पुलिस को इस बात की चिंता नहीं होती कि सड़क पर गिरे व्‍यक्ति से शराब कहां से लेकर उसका सेवन किया. ग्रामीण क्षेत्रों में शराबी की कमी आज भी नहीं है.

नवादा गांव में भी शराब देर रात बनाने और थोक में बेचने का काम होता था मगर गांव वालों की सक्रियता के कारण गांव में शराब बनाने का काम बंद हो गया. यहां के लोग शराब बनने से काफी परेशान थे इस कारण वह प्रति दिन पुलिस को इस बात की सूचना दे कर छापामारी करवा दिया करते थे. मगर राजधानी से दूर दराज के थाने में आज भी शराब बनाया जा रहा हैं और बेचा जा रहा है.

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1 Comment

  1. kahan nahi mil rahi sarab. bat alag hai ki kal tak khuleaam sarab bikti thi aur log pite the, ab andargraund hain sarab pine aur bechne wale. kul malakar yah kahne me koi sankoch nahi hai ki jab tak pine wale pite rahenge tab tak bikti rahegi sarab aur nitish sarkar dhindhora pitegi purna sarab bandi ka.

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