“उसके जाने के बाद” नाटक में दिखा माँ के न होने का दर्द

पटना: संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की ओर से व्यक्तिगत अनुदान के तहत सरगम आर्ट्स की प्रस्तुति “उसके जाने के बाद” नाटक का मंचन हुआ. माँ शब्द कानों में पड़ते ही ममता और प्रेम की अनुभूति होती है प्रेम, करुणा, त्याग, बलिदान की वो प्रतिमूर्ति है. जिसके बग़ैर सृष्टि का निर्माण संभव नहीं और न ही गृहस्ती की कल्पना की जा सकती है. माँ को केंद्र में रख कर “उसके जाने के बाद ” नाटक की परिकल्पना की गई है.

नाटक के माध्यम से ये दिखाने की कोशिश की गई है कि माँ के रहते हमें उसकी क्या अनुभूति होती है. जब वो माँ इस दुनिया से विदा हो अपने असीम सुख की प्राप्ति कर लेती है. जिब वो इस लोक में छोड़ विदा होती है, वो इनकी इस अनुभूति को कितना स्वीकारते है. जो उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा होते है.

देखा जाये तो किसी भी व्यक्ति या वस्तु की उपयोगिता तब तक हमारी समझ में नहीं आती जब तक वो हमारे लिए सुलभ होता है. जब वो हमारी पहुँच से बाहर होता है तब हम सोचते है कि क़ाश वो हम से जुदा न होता. “उसके जाने के बाद” नाटक में एक तरफ उर्वी है, जो कि सलोनी की बेटी होती है. जिसके पैदा होते ही सलोनी प्रलोक सिधार जाती है. वो माँ के न रहने के एहसास से हमेशा दुःखी रहती है. दूसरी ओर सलोनी एक ऐसी लड़की होती है, जिसके साथ जुड़ी उसकी माँ की यादें होती है.


माँ के जीवित रहते मायका उसके लिए कभी मायका नहीं बल्कि उसे अपना घर महसूस होता है, पर उसके जाने के बाद क्रिया – रस्म पर ही उसे ये एहसास दिला दिया जाता है कि अब वो इस घर के लिए केवल मेहमान है. अब ये उसका घर नहीं रहा. वो अपनी माँ की यादें समेट कर अपने ससुराल जाने को विवश हो जाती है. पूरा नाटक माँ और बेटी के रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है.

मंच पर-

सलोनी 1 – अपर्णा राज, सलोनी 2 – सुनिधि रॉय, सलोनी का बचपन, उर्वी – निशिका आनंद सूत्रधार,  पड़ोसन – निधि आनंद, माँ / भाभी – लुसी रॉयल

मंच से परे:

(1) संगीत संयोजन – लुसी रॉयल, (2) संगीत संचालन – रौशन सिन्हा, (3) मंच-सज्जा – सुनील, (4) वस्त्र विन्यास – अल्पना, (5) रूप-सज्जा – आदिल रशीद, (6) प्रकाश -विनय राज, (7) सहयोग – ब्रजेश, आलेख व निर्देशन – अर्चना सोनी.

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