भगवा रंग : संयम और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक

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लाइव सिटीज डेस्क : रंग सात होते हैं. ये सात रंग इंद्रधनुष में साफ तौर पर देखे जा सकते हैं. वैसे मूल रंग 3 ही होते हैं लाल, नीला, और पीला. इनमें सफेद और काला भी मूल रंग में अपना योगदान देते हैं. यदि लाल रंग मे पीला रंग मिला दिया जाए, तो केसरिया (भगवा) रंग बनता है. यदि नीले में पीला मिल जाए, तब हरा बन जाता है. इसी तरह से नीला और लाल मिला दिया जाए तब जामुनी रंग बन जाता है.

इनमें भगवा (केसरिया) रंग काफी चर्चा में बना रहता है. भगवा रंग से बने वस्त्रों को साधु संन्यासी लोग पहनते हैं. क्योंकि भगवा वस्त्र अग्नि का प्रतीक होता है. भगवा वस्त्र धारण कर संन्यासी अपने अहंकार और वासनाओं को नियंत्रण में रखता है.
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भगवा रंग का धार्मिक महत्व  

अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है, इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिंदू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है. सत्कार और उपकार, अर्थात मेहमानों का आदर करना और असहाय लोगों की सहायता करना भी वैदिक परंपरा का हिस्सा है. केसरिया रंग इन दोनों क्रियाओं का भी प्रतिनिधित्व करता है.

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सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है जो किसी भी प्रकार की मोह-माया के बंधन से मुक्त होकर संसार को त्याग चुके हैं. वे लोग जो अपने संबंधों और इच्छाओं को छोड़कर ईश्वर की शरण में ही अपनी दुनिया बसा चुके हैं, वे भगवा वस्त्र पहना करते हैं. इससे आशय यह है कि भगवे वस्त्र को संयम और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है.

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सनातन धर्म के अलावा अन्य भी बहुत से धर्मों में केसरी रंग को पवित्र माना गया है. जैसे कि बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के वस्त्रों को ही केसरिया रंग का दिखाया गया है. बौद्ध धर्म में यह रंग आत्म त्याग का प्रतीक माना गया है. आत्म त्याग अर्थात स्वयं को दुनियावी चीजों से निकालकर माया-मोह के बंधन से मुक्त करना. ऐसा माना जाता है कि बुद्ध धर्म के लिए यह रंग आत्मत्याग का प्रतीक है. यह रंग उन्हें दुनिया से अलग कर केवल भगवान से जोड़ता है.

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