हाथ-मुंह काला कर के भी ‘होरहा’ खाने का मजा ही कुछ और है

सासाराम (राजेश कुमार) : बिहार, खासकर शाहाबाद प्रक्षेत्र में विलुप्ति के कगार पर पहुंची चना की खेती से गावों का चटखारा व्यंजन ‘होरहा’ का मलाल लोगों को सालने लगा है. रबी मौसम में होने वाले चने की फसल के पकने पर डंठल समेत पुआल की आग में भून कर तैयार होने वाला होरहा के खाने वालों का भले ही हाथ-मुह काला हो, पर खाते हैं चटखारे लेकर. वह भी अकेले नहीं, संगत में खाने का मजा ही कुछ और है. गांव में बचपन बिताये सात समंदर पार रह रहे शाहाबाद के लोगों को आज भी मार्च महीने में होरहा की याद सताती है.

रबी मौसम में होने वाले चना को पुराने ज़माने में घोड़ा का आहार मानकर उपजाए जाने का प्रचलन था. कम ही लोग इसके दाल के शौक़ीन हुआ करते थे. उस समय भी लोगों के बीच फसल में हरियाली आने पर पौधे के मुलायम पत्तियों का साग, ढेढी (फल) लगने पर ‘कचरी’ और पक जाने पर ‘होरहा’ को चटखारे लेकर खाया करते थे. जब गावों में घोड़ा रखने का प्रचलन समाप्त हुआ तो किसानों की रूचि चना की खेती से घटने लगी. रबी फसलों में दिनो दिन उन्नत किस्म के गेहूं के पैदावार के सामने कम दर वाले चना की खेती से लोग परहेज करने लगे है. अब इस फसल को सिर्फ साग, कचरी और होरहा के शौक़ीन किसान ही कम मात्रा में इस फसल को पैदा करते हैं.

भुने जा रहे चने के डंठल और तैयार होरहा

सासाराम प्रखंड के गोबिना गांव के प्रगतिशील किसान टूनून सिंह की माने तो गावों में गिनती के किसान ही इस फसल को 5 कट्ठा से लेकर 2 बीघे में चना की खेती करते है. वह भी उसे बचाने में उन्हें नाको चने चबाने पड़ते है. इसमें खाद और सिंचाई की भले ही जरुरत ना पड़े, पर समय-समय पर उपचार के लिए दवाओं में खर्च होने वाले पैसे की तुलना में उपज नहीं ले पाते. अब तो इस खेती को सिर्फ एक महीने के मौसम में साग, कचरी व होरहा के लिए ही करते है.

बताते है, अभी चार दिन पहले की तो बात है, उनका भतीजा सौरव जो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में रहता है. अपने काम के सिलसिले में भारत आया था. सिर्फ होरहा खाने के लिए मौका निकाल कर दो दिनों के लिए गांव आया. दो दिनों तक छक कर खाया और जाते वक्त होरहा भुनवा कर सिडनी लेते गया. वही कार्यरत उसकी इंजिनियर पत्नी भी होरहा की शौक़ीन है. वहां पहुंच कर उसने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के कुछ मित्रों ने भी साथ बैठ होरहा का चखा. उनकी टिप्पड़ी रही, ‘हाथ मुंह तो काला हुआ पर है ये मजेदार’.

बताते है पुआल की जलते लौ के ऊपर दो डंडों के सहारे चना के पके पौधों को तबतक रखा जाता है. जब तक उसके डंठल जल ना जाये. आग में तप कर बची हुयी ढेढी (फल) को सूप से झाड़ कर साफ़ किया जाता है. फिर नमक के साथ हरी मिर्च व लहसून को कूट कर बनी चटनी के साथ होरहा खाने का मजा ही कुछ और है. तब है कि झुलसी हुयी ढेढी से पका हुआ चना निकालने के लिए तल्हात्थियों से ढेढी को रगड़ने में हाथ और खाने में मुह तो काला हो ही जाता है.

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