पिता के संस्कार और लाल बत्ती गाड़ी से प्रभावित होकर बना आईआरएस – अजय सिंह

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पटना (नियाज आलम) : बचपन में दीवाली के पटाखे से दुर्घटना ग्रस्त होकर अपनी आंख और कान से आंशिक रूप से विक्लांग होने के बाद सिविल सेवा की परीक्षा में सफलता प्राप्त करने वाले अजय सिंह हर उस युवा के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो असफलताओं को किसी न किसी बहाने से भाग्य को लेखा करार देने की कोशिश करते हैं. वर्तमान में झारखंड की राजधानी रांची में आयकर आयुक्त के पद पर कार्यरत् अजय सिंह अपनी बायोपिक ‘अजब सिंह की गजब कहानी’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं. पटना के होटल कौटिल्य विहार में संवाददाता सम्मेलन में शामिल होने आए अजय सिंह से खास बातचीत में उन्होंने अपने आईआरएस बनने से लेकर अपनी बायोपिक में काम करने तक के अनुभव को साझा किया. पेश है उनसे खास बातचीत के प्रमुख अंश :

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प्रश्न – शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद आपने लोक सेवा में आने की प्रेरणा कहां से ली?

उत्तर – घाघरा नदी के किनारे डुमरी नाम का मेरा गांव है, जहां अक्सर बाढ़ की समस्या रहती थी. इसके लिए जिला अधिकारी और पुलिस अधीक्षक लाल बत्ती गाड़ी से आकर क्षेत्र का दौरा करते थे. उन्हें देखकर मैं बाल मन से अपने पिता जी से पूछता ता कि ये लोग कौन हैं? इसी बाल प्रश्न के उत्तर में मेरे पिता जी कहते कि ये वह लोग हैं जो माता पिता का सम्मान करते हैं. पूजा पाठ कर परमात्मा को याद करते हैं और देश के लिए अच्छा सोचते हैं और ऐसे ही लोग आगे चल कर इतने बड़े अधिकारी बनते हैं।  पिता जी के इसी संस्कार और उन लाल बत्ती गाड़ियों को देखकर मेरे मन में उन जैसा बनने का विचार आया और मैने सोचा कि वैसा बनने के लिए मैं पूरी मेहनत करुंगा.

प्रश्न – जिस लोक सेवा परीक्षा में सक्षम छात्र भी आसानी से हाथ नहीं डालते उसमें सफलता प्राप्त करने में आपको कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा?

उत्तर – मेरा मानना है कि परमात्मा ने हर व्यक्ति को विशिष्ट प्राणी बनाया है. दरअसल सिविल सेवा की परीक्षा के लिए दो चीज़ जरूरी है। पहली चीज तो यह कि आपको लिखना आना चाहिए और दूसरी यह कि आप में दूर तक सोचने की क्षमता हो. ये दो चीज़ है तो सिविल सेवा की परीक्षा कठिन नहीं है. मुझे तो इससे कठिन बैंक की परीक्षा लगती है.

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प्रश्न – किसानों की समस्याओं पर आपने काफ़ी काम किया है. इसका विचार कहां से आया?

उत्तर – देखिए मेरे माता पिता गरीब किसान थे. क्योंकि मैं किसान परिवार स हूं इसलिए उनकी सभी समस्याओं को अच्छी तरह समझता हूं और इसी कारण उनकी समस्याओं के समाधान की हर संभव कोशिश की.

प्रश्न – नौकरशाह होना और फिल्म में अभिनय करना दोनों काफी अलग विषय है. कैसा अनुभव रहा.

उत्तर – निश्चित रूप से यह एक अलग तरह का अनुभव रहा. इसके लिए फिल्म के निर्देशक ने काफी सहयोग किया और मैं अच्छी तरह से अभिनय कर पाया. (हंसते हुए) फिल्म में अभिनय करना आईआरएस बनने से अधिक कठिन कार्य है.

प्रश्न – इस फिल्म का क्या उद्देस्य है और युवा पीढ़ी के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर –  फिल्म का उद्देश्य युवा पीढ़ी को प्रतिकूल स्थिति में भी कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देने का है. गरीब या मजबूर पैदा होना हमारा दोष नहीं लेकिन उसी स्थिति में मर जाना हमारी असफलता है. हमें हर हाल में चुनौतियों को स्वीकार करके आगे बढ़ना चाहिए. युवाओं के लिए यही संदेश है कि खामोशी से कोशिश करते रहे, सफलता अपने आप शोर मचा देगी.

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