ऐसे शुरू हुआ लोक आस्था का महा पर्व छठ

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लाइव सिटीज डेस्क (आदित्य नारायण): लोक आस्था का महा पर्व छठ शुरू हो गया है. हिंदू धर्म में किसी भी पर्व की शुरुआत स्नान के साथ होती है और यह पर्व भी स्नान यानी नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ. शनिवार को खरना की जाएगी. जिसके साथ ही छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होगा जो सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के बाद समाप्त होगा. भक्तों की अटल आस्था के इस अनूठे पर्व में सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में अंतिम किरण को अर्घ्य देकर सूर्य को नमन किया जाता है. इस पर्व से जुड़ी कई लोक कथाएं हैं. आइये जानते हैं कुछ ऐसी मान्यताओं के बारे में जहां से सुर्योपासना की परंपरा शुरू होने का पता चलता है.

सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भागवत आदि में विस्तार से की गयी है. सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों में सूर्य की उपासना अलग-अलग रूपों में होती रही है. लेकिन देवता के रूप में सूर्य की वन्दना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है. उपनिषद् आदि वैदिक ग्रन्थों में भी इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई है. निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा. उत्तर वैदिक काल के अन्तिम कालखण्ड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी. इसने कालान्तर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया.

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पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक हो गया. अनेक स्थानों पर सूर्यदेव के मंदिर बनाये जाने लगे. इस कालखंड में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था. सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी. एक बार भगवान कृष्ण के पौत्र शांब को कुष्ठ रोग हो गया था. तब उन्हें इस रोग से मुक्त करने के लिए विशेष सूर्योपासना की गई थी. ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका विशेष प्रभाव पाया. संभवत: यही छठ पर्व के उद्भव की बेला रही हो.

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रामायण और महाभारत में भी सुर्योपासना कई रूपों में देखने को मिलती है. मान्यताओं के अनुसार भगवान राम ने लंका विजय के बाद माता सीता के साथ सूर्यदेव की आराधना की तो वहीं महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण हर दिन भगवान भास्कर की पूजा करते थे. कर्ण अंग प्रदेश यानी वर्तमान बिहार के भागलपुर के राजा थे. वे घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया करते थे. इन्हीं की कृपा से वो परम योद्धा बने. छठ में आज भी अर्घ्य देने की परंपरा है. महाभारत काल में ही पांडवों की भार्या द्रौपदी द्वारा भी सूर्य उपासना करने का उल्लेख है, जो अपने परिजनों के स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना के लिए नियमित रूप से यह पूजा करती थीं.

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पुराण में इस बारे में एक और प्रचलित कथा राजा प्रियवद की है. जिनका कोई संतान नहीं था. ऋषि कश्यप की सलाह पर उन्होंने पुत्रसृष्ठि यज्ञ किया. यज्ञ के बाद उन्हें संतान की प्राप्ति तो हुई पर वह मृत पैदा हुआ. राजा इससे बहुत दुखी हुए और अपने मृत बालक को सीने से लगाए एकटक आसमान की ओर देखते रहे. उनके सीने से मृत बालक को हटाने की हिम्मत किसी को नहीं हो रही थी. इसी बीच आसमान से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं. यह और कोई नहीं षष्ठी देवी थी.

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उन्होंने राजा से कहा कि मैं बालकों की देवी हूं. मैं ब्रह्माजी की मानस पुत्री हूं. मेरे आशीर्वाद से नि:संतानों को भी संतानसुख मिलता है. इसके बाद राजा ने उनकी स्तुति की. उनके आशीर्वाद से राजा का मृत बालक जीवित हो उठा. छठी मइया ने राजा से कहा कि पृथ्वी पर ऐसी व्यवस्था हो कि सब उनकी पूजा करें. राजा की आज्ञा पर हर शुक्ल पंचमी को षष्ठी देवी की पूजा होने लगी. कार्तिक व चैत्र मास में भी छठ पूजा होने लगी.

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