वीर कुंवर सिंह : जिन्होंने अस्सी की उम्र में दिखायी वीरता

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सासाराम (राजेश कुमार) : अस्सी वर्ष की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला देने वाले तत्कालीन शाहाबाद (अब भोजपुर) के जगदीशपुर के निवासी बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरता की याद आज भले ही नयी पीढ़ी के जेहन में धुंधली हो गयी हो, पर आज भी उनकी याद में हर वर्ष 23 अप्रैल को मनाये जाने वाले विजय दिवस पर जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित कर लोग उनके शौर्य की गाथा गाते है. क्षत्रिय कुल के उस उज्जैन राजपूत राजा भोज के वंशज बाबू साहबजादा सिंह के पुत्र वीर कुंवर सिंह की वीरता की पहचान वर्ष 1845-46 में ही हो गयी थी, जब ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले षड्यंत्र में भंडाफोड़ होने की वजह से वीर कुँवर सिंह अंग्रेजों की हिट लिस्ट में आ गए थे.

1857 की क्रांति में वीर कुंवर सिंह की रही भूमिका को आज भी भोजपुरी पवरा (गीतों) में “बाबू कुंवर सिंह, तेगवा बहादुर, बँगला में उड़े ला अबीर” होली के गीतों में पिरो कर व्यक्त करते हैं. इस योद्धा का तब के शाहाबाद जिले में ही पड़ने वाले सासाराम अनुमंडल (जो आज रोहतास जिला बन गया है) से गहरा नाता रहा है.

1857 की क्रांति, जब एक-एक कर भारतीय रियासत में बगावत की आग भड़क चुकी थी

दानानुर रेजीमेंट, बंगाल के बैरकपुर, रामगढ़ के सिपाही विद्रोह, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झाँसी, दिल्ली में विद्रोह की आग भड़क उठी थी. दानापुर के तीनों देशी पलटन 25 जुलाई 1857 को वीर कुँवर सिंह के नेतृत्व में आ गए थे. 27 जुलाई को अँग्रेजों के ठिकाने रहे आरा पर कब्जा कर लिया था. अँग्रेजों के साथ किसी भी लड़ाई में वीर कुँवर सिंह को हार का सामना नहीं करना पड़ा था. तब कुँवर सिंह को वहाँ का शासक घोषित कर दिया गया था.

आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कुँवर सिंह ने वर्तमान के रोहतास जिले के नोखा, बरांव, रोहतास, सासाराम, रामगढ़ के अलावे यूपी के  मिर्जापुर, बनारस, अयोध्या, लखनऊ, फैजाबाद, रीवां बांदा, कालपी, गाजीपुर, बांसडीह, सिकंदरपुर, मानियर और बलिया का दौरा कर संगठन खड़ा किया था. उसी दौरान वीर कुंवर सिंह कुछ दिन के लिए सासाराम की छोटी जागीरदार हाजी बेगम के यहाँ ठहरे थे. विधवा हाजी बेगम ने क्रांति योद्धा कुंवर सिंह व उनके सहयोगी अमर सिंह, निशान सिंह की धर्म बहन बन कर उन्हें राखी बांधा था.

वीर कुअंर सिंह की दो दुर्लभ तस्वीर

उसी क्रम में वीर कुँवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार कर रहे थे कि डगलस की सेना ने उन्हें घेर लिया. बीच गंगा में उनकी बाँह में गोली लगी थी. गोली का जहर पूरे शरीर में फैल सकता था. इसे देखते हुए वीर कुँवर सिंह ने अपनी तलवार उठाई और अपना एक हाथ गंगा नदी में काटकर फेंक दिया. वहाँ से वह 22 अप्रैल को 2 हजार सैनिकों के साथ जगदीशपुर पहुँचे. अंतिम लड़ाई में भी उनकी जीत हुई लेकिन उसके तीन दिन बाद वीर कुँवर सिंह संसार से हमेशा के लिए विदा हो गए.

होनहार वीरवान के होत चिकने पात

रणबांकुरा वीर कुंवर सिंह के बाल्य काल में पढ़ाने हेतु उनके राजा पिता ने एक शिक्षक उपलब्ध कराया था. उस ज़माने में शिक्षण कार्य में  मुल्ला–मौलवी ही हुआ करते थे.  इस 8 वर्ष के बालक को जब पहले दिन मौलवी ने उन्हें पाठ याद करने के लिए बोला, लेकिन बालक पाठ याद करने से दो टूक शब्द में निर्भीकतापूर्वक मना कर दिया. मौलवी ने उन पर छड़ी तान दी. तभी बालक ने बाजु में रखे तलवार को म्यान से खीच कर टीचर पर ही तान दिया.

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दुहाई सरकार,  याह अल्लाह और याह मौला चिल्लाते हुए कुंवर सिंह के पिता जी के चरणों में मौलवी गिर पड़े. सारा वाक्या सुनने पर वीर बालक के पिता भी फुले न समाये. पिता ने ख़ुशी के उमंग में बोले, क्षत्रिय जन्म लेने से पहले ही तलवारबाजी में निपुण होते है. इस लिए उन्होंने मौलवी को वहां से विदा कर दिया.

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अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मलेन के महामंत्री और एसपी जैन कालेज सासाराम के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ गुरुचरण सिंह ने कहा कि भोजपुरी भाषा भासी क्षेत्र की शान रहे बाबू कुंवर सिंह की जीवनी एक खुली किताब रही है जिससे हर पीढ़ी को सत्यनिष्ठा, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की शिक्षा मिलती है. आज उनकी जीवनी से नयी पीढ़ी को अवगत कराने की जरुरत है.

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