महाशिवरात्रि पर जानें शिव को शिवलिंग के रुप में क्यों पूजते हैं? पहला शिवलिंग कहां से आया था…

लाइव सिटीज डेस्क : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि (बोलचाल में शिवरात्रि) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस दिन का त्यौहार का लोगों के लिए बहुत ही महत्व होता है. महाशिवरात्रि के त्यौहार लाखों शिव भक्तों द्वारा हर साल मनाया
जाता है. इल साल 13 फरवरी को शिवरात्रि मनाया जा रहा है. लेकिन क्या आपको पता है भगवान शिव की पूजा हम लिंग के रूप में ही क्यों करते हैं, यहां तक कि मंदिरों में भी लिंग की ही पूजा होती है और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा होती है.

तो ऐसा क्यों है कि शिव की पूजा शिवलिंग के रूप में होती है? क्या महत्त्व है इसका? दरअसल शिव लिंग को शक्ति और शाक्यता के रूप में पूजा जाता है. शिवलिंग में योनि को मां शक्ति का प्रतीक माना जाता है. शिव लिंग यह दर्शाता है कि पूरा ब्रह्माण्ड पुरुष और महिला की ऊर्जा से बना है. आज शिवरात्रि के दिन हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इसकी उत्पति कैसे हुई, इससे संबंधित एक कथा लिंगमहापुराण में है.

आत्‍मा का प्रतीक

संस्कृत भाषा के अनुसार, “लिंग” का मतलब है चिह्न या प्रतीक, जैसा की हम जानते हैं कि भगवान शिव को देवआदिदेव भी कहा जाता है. जिसका मतलब है कोई रूप ना होना. भगवान शिव अनंत काल और सर्जन के प्रतीक हैं. भगवान शिव प्रतीक है आत्मा के जिसके विलय के बाद इंसान पाराब्रह्मा को पा लेता है.

ऐसे हुई थी शिवलिंग की स्थापना

लिंगमहापुराण के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया. स्वयं को श्रेष्ठ बताने के लिए दोनों देव एक-दूसरे का अपमान करने लगे. जब उनका विवाद बहुत अधिक बढ़ गया, तब एक अग्नि से ज्वालाओं के लिपटा हुआ लिंग भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच आकर स्थापित हो गया.

नहीं समझे रहस्‍य

दोनों देव उस लिंग का रहस्य समझ नहीं पा रहे थे. उस अग्नियुक्त लिंग का मुख्य स्रोत का पता लगाने के लिए भगवान ब्रह्मा ने उस लिंग के ऊपर और भगवान विष्णु ने लिंग के नीचे की ओर जाना शुरू किया. हजारों सालों तक खोज करने पर भी उन्हें उस लिंग का स्त्रोत नहीं मिला. हार कर वे दोनों देव फिर से वहीं आ गए जहां उन्होंने लिंग को देखा था.

सुनाई दिया ओम का स्‍वर

वहां आने पर उन्हें ओम का स्वर सुनाई देने लगा. वह सुनकर दोनों देव समझ गए कि यह कोई शक्ति है और उस ओम के स्वर की आराधना करने लगे. भगवान ब्रहमा और भगवान विष्णु की आराधना से खुश होकर उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और दोनों देवों को सद्बुद्धि का वरदान भी दिया. देवों को वरदान देकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए और एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए. लिंगमहापुराण के अनुसार वह भगवान शिव का पहला शिवलिंग माना जाता था. जब भगवान शिव वहां से चले गए और वहां शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए, तब सबसे पहले भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के उस लिंग की पूजा-अर्चना की थी. उसी समय से भगवान शिव की लिंग के रूप में पूजा करने की परम्परा की शुरुआत मानी जाती है.

विश्वकर्मा ने किया था विभिन्न शिवलिंगों का निर्माण लिंगमहापुराण के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने देव शिल्पी विश्वकर्मा को सभी देवताओं के लिए अलग-अलग शिवलिंग का निर्माण करने को कहा था. भगवान ब्रह्मा के कहने पर भगवान विश्वकर्मा ने अलग-अलग शिवलिंग बना कर देवताओं को प्रदान किए.

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