रहस्य कहें या चमत्कार, घी-तेल से नहीं पानी से जलता है माता के इस मंदिर का दीया

लाइव सिटीज डेस्क : आज भी भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जहाँ बड़े से बड़े चमत्कार होते हुए देखे गए हैं और ये चमत्कार भी ऐसे हैं, जिसे देखने के बाद वैज्ञानिक भी सकते में आ जाते हैं. ऐसा ही चमत्कार देखा जाता है अति प्राचीन और अनोखे गड़ियाघाट वाली माता के मंदिर में, जहां माता के मंदिर में जलनेवाली ज्योत तेल या घी से नहीं, बल्कि पानी से जलाई जाती है

आपने तेल और घी से जलते हुए घी देखे होंगे, लेकिन आपने पानी से जलते हुए किसी दीपक को नहीं देखा होगा. ये सुनकर आपको काफी अजीब लगेगा कि पानी और आग का मेल कैसे हो सकता है. भला ऐसे में पानी से दीपक कैसे जल सकता है. अगर ऐसा है तो ये चमत्कार ही है और इसके अलावा क्या हो सकता है.



आज आप यहां एमपी के आगर मालवा जिले के एक ऐसे मंदिर के बारे में जानेंगे, जहां पिछले कई सालों से तेल या घी से नहीं, बल्कि पानी से दीपक जल रहा है. ये सच है और क्या है इसके पीछे का रहस्य और ये सब कैसे शुरू हुआ. नलखेड़ा से 15 किलोमीटर दूर गाड़िया घाट गांव के पास काली सिंध नदी के किनारे पर यहां एक देवी मंदिर बना हुआ. माता के इस मंदिर में ये चमत्कार हो रहा है.

यहां दीपक पानी से जल रहा है. ये सब पिछले पांच साल से हो रहा है. मां की महिमा सुनकर भक्त दूर-दूर से आते हैं. इस दीए में पानी डालने पर चिपचिपा हो जाता है, जिससे दीपक लगातार जलता रहता है. ये दृश्य जब श्रद्धालु देखते हैं तो इनकी श्रद्धा-भक्ति और बढ़ जाती है. इस मंदिर के पुजारी ने दावा किया है कि इस मंदिर में पिछले पांच सालों से पानी से ज्योति जल रही है.

यहां के पुजारी के मुताबिक, पहले देवी मां के मंदिर में हमेशा तेल का दीया जलता था. एक दिन उन्हें सपने में मां ने दर्शन दिए और कहा- तुम अब से पानी का दीपक जलाओ. देवी मां के अनुसार पुजारी ने जब पानी से दीपक जलाया तो वह जल उठा. जब इस चमत्कार को ग्रामीणों ने देखा तो इन्हें इस दृश्य पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब उन्होंने दीए में पानी डाल कर इसे जलाया तो ये जल उठा. उस दिन के बाद से मंदिर में पानी से दीपक जलाया जा रहा है.

बरसात में नहीं जलता दीया

पानी से जलने वाला ये दीया बरसात के मौसम में नहीं जलता है. दरअसल, वर्षाकाल में कालीसिंध नदी का जल स्तर बढ़ने से यह मंदिर पानी में डूब जाता है, जिससे यहां पूजा करना संभव नहीं होता. इसके बाद शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन यानी पड़वा से दोबारा ज्योत जला दी जाती है, जो अगले वर्षाकाल तक लगातार जलती रहती है.