अक्षय तृतीया : शुभ मुहूर्त और महत्व

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लाइव सिटीज डेस्क :अत्यंत शुभ और पवित्र मानी जाने वाली अक्षय तृतीया, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में जब सूर्य और चन्द्रमा अपने उच्च प्रभाव में होते हैं तब पड़ती है. इस समय दोनों ही अपने उच्चतम बिंदु पर होते हैं. इस तिथि को हिन्दू पंचांग के अनुसार अत्यंत शुभ माना जाता है व अक्षय तृतीया के रूप में  मनाया जाता है. इस वर्ष अक्षय तृतीया 28 अप्रैल को मनाई जाएगी. शुभ नक्षत्रों के योग के  कारण इस दिन अत्यंत शुभ मुहूर्त होता है.

इस वर्ष अधिकतर त्योहार 2 दिन मनाए जा रहे हैं, इसी प्रकार अक्षय तृतीया भी 28 अप्रैल  तथा 29 अप्रैल की सुबह तक मनाई जाएगी. अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं –

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त- प्रात: 10.29 से दोपहर 12.18 तक, 28 अप्रैल 2017
 
तृतीया तिथि प्रारंभ- 10.29 बजे, 28 अप्रैल 2017
 
तृतीया तिथि समाप्ति- 6.55  बजे, 29 अप्रैल 2017

बता दें कि हिंदू पर्व अक्षय तृतीया को एक पावन पर्व माना जाता है. इस मौके पर लोग घर में नए सामान या सोने के आभूषण खरीदते हैं. बैसाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया अक्षय तृ‍तीया कहा जाता है.

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अक्षय तृतीया से जुड़ी कथाएंः 

अक्षय तृतीया को भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मदिवस के रुप में भी मनाया जाता हैं. वहीं इस दिन त्रेता युग का आरंभ माना जाता हैं. कहते है कि गंगा नदी का धरती पर अवतरण भी इसी दिन हुआ था. महर्षि वेदव्यास ने इस दिन महाभारत की रचना प्रारंभ की थी जिसे भगवान गणेश ने लिपिबद्ध किया था. वहीं पांडवों के वनवास के दौरान भगवान कृष्ण ने उन्हे अक्षयपात्र दिया था जिससे अन्न का कभी क्षय नहीं होता. द्रौपदी के चीर हरण की घटना भी इस दिन घटी थी जहां भगवान कृष्ण ने चीर को अक्षय बना दिया था. इसी प्रकार श्री कृष्ण ने इस दिन अपने बाल सखा सुदामा की सहायता की थी और उन्हे दरिद्रता से मुक्त कराया था. जबकि कुबेर ने शिवपुरम में इस दिन भगवान शिव की पूजा करके अपनी समृद्धि वापस पार्इ थी. उड़ीसा में अक्षय तृतीया के दिन से रथ यात्रा के लिये रथ बनाने का कार्य शुरु कर दिया जाता है. इसी दिन प्रसिद्घ तीर्थस्थल बद्रीनाथ के कपाट भी खुलते है. वहीं वृंदावन स्थिति श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में केवल इसी दिन से विग्रह के चरण दर्शन होते है, जो कि पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते है.
महत्वः
अक्षय तृतीया सुख समृद्धि से जुड़ा हुआ है. चूंकि सोना समृद्धि का प्रतीक है और समृद्धि कभी क्षय न हो इसलिए लोग अक्षय तृतीया को सोना खरीदते हैं तथा अक्षय तृतीया को वैभव लक्ष्मी की श्री विष्णु के साथ पूजा की जाती है. धन के देवता माने जाने वाले कुबेर की पूजा भी अक्षय तृतीया के दिन की जाती है. इस दिन भगवान शिव पार्वती तथा गणेश भगवान की भी पूजा की जाती है. पुण्य की प्राप्ति के लिये किये जाने वाले कार्य जैसे जाप, तप, हवन, यज्ञ, दान आदि भी किये जाते हैं ताकि अक्षय पुण्य की प्राप्ति हो. इस दिन लक्ष्मी नारायण मंत्र का जाप करने से तथा भगवान विष्णु की लक्ष्मी जी के साथ पूजा करने से निश्चित रुप से सुख समृद्धि में वृद्धि होगी. इस दिन भगवान विष्णु को तिल, चावल, भीगे हुए चने, दाल और मिठाईयों का भोग चढ़ाया जाता है, जबकि देवी पार्वती को गेहुं, चना, दूध, दही, खीर, गन्ना, स्वर्ण और कपड़े आदि चढ़ाने की परंपरा है. भगवान गणेश की पूजा इस दिन किसी भी नये कार्य को शुरु करने के पहले की जाती हैं. वहीं भगवान श्री कृष्ण की पूजा मोक्ष प्राप्ति के लिये की जाती है. शिव भगवान की पूजा अच्छे स्वास्थ्य और भाग्य के लिये की जाती है.
दान-पुण्य का महत्वः 
अक्षय तृतीया का दिन दान-पुण्य के लिए भी विशेष माना जाता है. इस विशेष अवसर पर गंगा इत्यादि पवित्र नदियों आैर तीर्थों का स्नान का विशेष फल मिलता है. जबकि यज्ञ, हवन, देव-पितृ तर्पण, जप, दान जैसे कर्मों से शुभ फल की प्राप्ति होती है. एेसा माना जाता है कि इस दिन गर्मी के मौसम की चीजें या यूं कह सकते है गर्मी में राहत देने वाली चीजों के दान से शुभ फल मिलता है. इसके अलावा इस दिन गेहूं, चना, जौ, चावल, खिचड़ी, गन्ने का रस, कपड़े, सोना-चांदी, दूध से बने पदार्थ, पानी का घड़ा, पंखा इत्यादि का भी दान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है.
जैन धर्म में अक्षय तृतीया का महत्वः 
जैन धर्म में अक्षय तृतीया का काफी महत्व है. इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव ने एक वर्ष की कड़ी तपस्या पूर्ण कर इक्षु रस यानि गन्ने के रस से पारायण किया था. ऋषभदेव ही आगे जाकर भगवान आदिनाथ के नाम से प्रसिद्घ हुए. जिन्होंने जैन धर्म में जैनी साधुआें तक भोजन पहुंचाने का तरीका प्रचारित किया था. भगवान श्री आदिनाथ ने लगभग 400 दिनों की तपस्या के पश्चात पारायण किया था. यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी एेसे में जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है. यह तपस्या कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ होती है आैर दूसरे वर्ष यानि वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है. भारत में इस प्रकार की वर्षी तपस्या करने वालों की संख्या हजारों तक पहुंच जाती है. यह तपस्या धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है अौर यही कारण है कि अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व समझा जाता है.
विभिन्न राज्यों में अक्षय तृतीया का महत्वः
अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा का पूर्वानुमान जानने के लिए शुभ माना जाता है. इस दिन राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है. राजस्थान के जोधपुर शहर में इस दिन बरसों पुरानी ‘धणी परंपरा’ को निभाते मौसम की भविष्यवाणी की जाती है कि इस बार जमाना कैसा होगा. वहीं कर्इ जगहों पर इस दिन लड़कियां झुंड बनाकर अच्छे मौसम आैर सुख-समृद्घि की कामना के साथ घर-घर जाकर शगुन गीत गाती है आैर लड़के पतंग उड़ाते है. इस अवसर पर सात तरह के धान से पूजा की जाती है. वहीं मालवा में अक्षय तृतीया पर नए घड़े पर खरबूजा आैर आम के पत्ते रखकर पूजा की जाती है. एेसा कहा जाता है कि इस दिन कृषि का कार्य आरंभ करना किसानों के लिए समृद्घिदायक है.

कैसे करें अक्षय तृतीया पर पूजा व उपवासः

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर व्रत या उपवास का संकल्प करें. इसके बाद पूजा स्थान पर विष्णु भगवान की मूर्ति या चित्र को साफ व स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर पूजन शुरू करें. सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं. इसके बाद चंदन व पुष्पमाला अर्पित करें. भगवान विष्णु को पूजा में जौ, चावल आैर चने की दाल अर्पित करें. इसके पश्चात विष्णु की कथा आैर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें. पूजा के बाद भगवान को भोग लगाएं आैर प्रसाद को सभी भक्तों में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें.

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