इस तरह करें सरस्वती पूजा, जानें मंत्र और पूरी पूजा विधि, बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी

लाइव सिटीज, सेंट्रल डेस्क : वसंत पंचमी का पर्व 10 फ़रवरी रविवार को मान्य जाएगा. माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सरस्वती पूजा और वसंत पंचमी के नाम से जाना जाता है. आज हम आपको सरस्वती पूजा का महत्व और सरस्वती पूजा क्यों मनाई जाती है उसके बारे में बता रहे हैं.

देवी सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं. सृष्टि की रचना के लिए देवी शक्ति में अपने आप को पांच भागों में विभक्त कर लिया. वे देवी राधा, पार्वती, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान कृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुईं. उस समय कृष्ण के कंठ से उत्पन्न हुए देवी को सरस्वती के नाम से जाना जाने लगा. देवी सरस्वती के अनेक नाम हैं. जिनमें से वाक्, वाणी, गी, गिरा, बाधा, शारदा, वाचा, श्रीश्वरी, वागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, सोमलता, वाग्देवी और वाग्देवता आदि प्रसिद्ध नाम है.

सरस्वती देवी सौम्य गुणों की दात्री और देवों की रक्षक हैं. सृष्टि का निर्माण इनकी मदद से हुआ है. इसीलिए माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सरस्वती पूजा के नाम से मनाया जाता है. माना जाता है इस दिन देवी सरस्वती का पूजन करने से विद्या और वाणी का वरदान मिलता है.

वसंत पंचमी

सरस्वती पूजा को वसंत पंचमी के रूप में भी मनाया जाता है. इस दिन देवी सरस्वती की विधिवत पूजा करके वसंतोत्सव मनाया जाता है और माँ की आराधना की जाती है. यह पूजा प्रत्येक वर्ष इसी दिन की जाती है जिसके साथ-साथ छोटे बालकों का अक्षरारंभ और विद्यारंभ भी किया जाता है.

वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा

माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रातःकाल जागकर देवी की पूजा करनी चाहिए. स्तुति के बाद संगीत आराधना भी करनी चाहिए. इसके बाद निवेदित गंध, पुष्प, मिष्ठानादि का प्रसाद चढ़ाकर सभी में बांटना चाहिए. विद्या से जुड़ी वस्तुओं में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है इसीलिए उनकी भी पूजा करें. तिलक, अक्षत लगाकर भोग लगाएं और धूप-दीप करें. अंत में प्रणाम करके माँ सरस्वती से प्रार्थना करें और विद्या का वरदान मांगे.

सफ़ेद वस्तुओं का प्रयोग करें

माघ शुक्ल पंचमी को अनध्याय भी कहा जाता है. देवी सरस्वती की उत्पत्ति सत्वगुण से हुई है. इनकी पूजा-आराधना में हमेशा श्वेत वर्ण की वस्तुओं का ही प्रयोग किया जाता है. जैसे –दूध, दही, मक्खन, सफ़ेद तिल के लड्डू, गन्ना या गन्ने का रस, पका हुआ गुड़, मधु, श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प, श्वेत परिधान, श्वेत अलंकार, खोए का श्वेत मिष्ठान, अदरक, मूली, शर्करा, सफ़ेद धान के अक्षत, तण्डुल, शुक्ल मोदक, पके हुए केले की फली का पिष्टक, नारियल, नारियल जल, श्रीफल, बदरीफल, पुष्प फल आदि.

अबूझ मुहूर्त के रूप में

ज्योतिष के अनुसार, वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन को सभी मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना जाता है. इसलिए इस दिन को अबूझ मुहूर्त के रूप में भी जानते हैं. नए कार्यों की शुरुआत के लिए इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है. परंतु विवाह और उससे जुड़े कार्यों के लिए पंचांग में दिए गए मुहूर्त को ही चुनना चाहिए.

सरस्वती पूजा 2019 (वसंत पंचमी 2019)

2019 में वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) 10 फरवरी 2019, रविवार को मनाई जाएगी.

वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा 2019 का शुभ मुहूर्त

  • सरस्वती पूजा मुहूर्त = 07:15 से 09:46
  • पंचमी तिथि का आरंभ = 9 फरवरी 2019, शनिवार को 08:54 बजे से होगा.
  • पंचमी तिथि समाप्त = 10 फरवरी 2019, रविवार को 09:46 बजे होगा.

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्योहार है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. यह पूजा बड़े उल्लास से मनायी जाती है. इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं.

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था. जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था. शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है.

कथा-

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की. अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे. उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है. विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा. इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ. यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी.

तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं. बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं.

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु.

अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है. पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।

पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है. लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा.

महत्व-

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है. मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं. हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है.

यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है. प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है. जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं.

कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है. चाहे वे कवि हों या गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं.

(ज्योतिषाचार्य श्रीपति त्रिपाठी)

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