देवशयनी एकादशी : 4 माह के लिए शुभ कार्यों पर लगेगा विराम

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लाइव सिटीज डेस्क : आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. यह 4 जुलाई से शुरू हो रहा है. कहा गया है कि सभी तरह के उपवासों में यह श्रेष्ठतम है. इसे करने से व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे विष्णुपद प्राप्त होता है. जीवन में की गई भूलों की क्षमा के लिए यह सबसे उत्तम व्रत है.

इस एकादशी पर भगवान शयन करते हैं मगर भक्तों के लिए कहा गया है कि अगले चार महीनों उन्हें अधिक अनुशासन से रहना है यानी कर्म और व्यवहार के प्रति अधिक जाग्रत रहना है. चूंकि अगले चार मास तक भगवान विष्णु पाताल लोक में शयन करते हैं और इसलिए समस्त शुभ कर्मों पर विराम लग जाता है.

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अब श्रीविष्णु देवोत्थानी एकादशी के दिन से फिर सृष्टि का कार्यभार संभालेंगे और शुभ कर्मों पर लगी रोक हटेगी. विश्वास है कि इन चार महीनों में पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं इसलिए चातुर्मास में केवल ब्रज की यात्रा से सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है. ये चार महीने व्रत, नियम और संयम के महीने हैं इसलिए इन महीनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते हैं और एक ही स्थान पर रहकर अनुशासन का पालन करते हैं.

शााों में वर्णन है कि इस एकादशी पर शंखासुर दैत्य का संहार करने के बाद भगवान ने चार मास तक क्षीरसागर में शयन किया और तभी से यह परंपरा बन गई. चूंकि शंखासुर के साथ भगवान विष्णु का युद्ध लंबे समय तक चला और अपनी थकान मिटाने के लिए भगवान विश्राम करने चले गए. पुराणों में यह भी कथा है कि श्री हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में उपस्थित होकर तीन पग दान में मांगे. पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया. अगले पग में संपूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया.

तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा. इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्ना होकर बलि को पाताल का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो. बलि ने वर में मांगा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य ही निवास कीजिए. विष्णुजी ने बलि को दिए वर का सम्मान किया.

बलि के बंधन में श्री हरि को बंधा देख लक्ष्मीजी चिंतित हुईं और उन्होंने बलि को भाई बनाकर उनसे विष्णुजी को मुक्त करने का अनुरोध किया. मगर तबसे विष्णु जी द्वारा दिए गए वरदान का पालन करते हुए तीनों देवता चार-चार माह के लिए सुतल में निवास करते हैं. विष्णुजी देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्माजी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं.

रखें इन चीजों का परहेज

  • देवशयनी एकादशी के दिन जो भक्त भगवान विष्णु का कमल पुष्पों से पूजन करते हैं वे एक तरह से तीनों लोकों के देवताओं के पूजन का फल पाते हैं.
  • इस दिन उपवास करने वाला व्यक्ति विष्णु भगवान की कृपा का भागीदार बनता है.
  • चातुर्मास के दौरान दीपदान एकादशी व्रत तथा पलाश के पत्तों पर भोजन करने वाले श्री हरि को अत्यधिक प्रिय होते हैं.
  • चातुर्मास में कुछ चीजों का परहेज करना चाहिए. जैसे सावन में साग, भादो में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दालों का त्याग करना चाहिए.
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