ईश्वर न्यायाधीश हैं और गुरू हितकर्ता: जीयर स्वामी

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लाइव सिटीज डेस्क : ईश्वर न्यायाधीश हैं. वे बुरे-भले के हिसाब से न्याय करते हैं, लेकिन गुरु हर हाल में अपने शिष्यों का कल्याण करते हैं. ईश्वर और गुरु में भेद नहीं करना चाहिये. गुरु को पहले स्मरण या वंदन करने से भगवान नाराज नहीं होते. भटकाव की स्थिति में गुरु भगवान से जोड़ने में सहायता करते हैं. गुरू का पहले स्मरण करना चाहिये. गुरु और आचार्य में ही भगवान की सत्ता मानें. ये बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ के क्रम में प्रवचन करते हुए कही. श्री जीयर स्वामी ने भागवत कथा के तहत सूत-शौनक संवाद की चर्चा को आगे बढ़ाया.

उन्होंने कहा कि परमात्मा एकमात्र जीवों के कल्याण के लिये अवतार लेते हैं. वे उत्पति, विकास एवं संहार को सामान्य रूप से लेते हुए जानने एवं जनाने वाले हैं. जिस तरह एक बच्चा बालू के रेत से घरौंदा बनाता है और उस घरौंदे को अपने ही पैरों से रौंद देता है. दोनों स्थितियों में बच्चे को खुशी मिलती है. किसान फसल बोता है, पोषित करता है और पकने पर फसल काट लेता है. यह उसका चक्रीय कृषि धर्म है. ठीक उसी तरह परमात्मा निर्माण के बाद दुनिया को अपने में समेट लेते हैं. यह उनकी एक सहज प्रक्रिया है.

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श्री स्वामी ने कहा कि सभी ज्ञान विद्या नहीं है. जो शास्त्र से निषेद्ध हो, अविद्या है. मनुष्य को शरणागति करनी चाहिये. सब में परमात्मा की सत्ता मानकर उसे आदर देनी चाहिये. शरणागति के लिये भक्ति करनी चाहिये. इससे अहंकार आने की संभावना नहीं रहती है. ‘भक्ति प्रियो माघवः’. उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ साधन यज्ञ, तप, वेद अध्ययन, तीर्थ और परोपकार है. श्रेय साधन वही है, जो हमारे साथ सदा रहता है. लोभ या लालच से भी प्राणियों का मन भगवान के चरणों में लग जाये तो यह भी भक्ति है.

संकट में आर्त भाव से भगवान को जानना भक्ति है. द्रौपदी एवं गजेन्द्र आर्त भक्त है. भयभीत अजामिल का अपने बेटे नारायण का स्मरण करना और विवेक शून्यता की स्थिति में अर्जुन द्वारा परमात्मा का स्मरण भी भक्ति है. यानी विशेष परिस्थिति में भी ईश्वर का स्मरण कर उनके प्रति समर्पित हो जाना भक्ति है. उन्होंने कहा कि व्यक्ति विशेष पर ध्यान नहीं देकर उसके व्यक्तित्व को आंकना चाहिये. व्यक्ति बड़ा होता है, लेकिन व्यक्ति से बड़ा व्यक्तित्व होता है. व्यक्ति में व्यक्तित्व नहीं, लेकिन व्यक्तित्व में व्यक्ति समाहित हो जाता है. यही कारण है कि समाज में व्यक्ति से ज्यादा व्यक्तित्व प्रभावित करता है.

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