इतिहास के स्वर्णाक्षरों में वर्णित है गिद्धौर की मां दुर्गा की महिमा

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गिद्धौर/जमुई (राजेश/सुशान्त) : गिद्धौर के पतसंडा की माँ दुर्गा की आराधना इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में वर्णन है. इस मंदिर का दुर्गा पूजा सदियों से चर्चित रहा है. उलाई तथा नागी नदी के संगम तट पर बने इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि यहाँ स्नान करने के उपरांत माता के मंदिर में हरिवंश पुराण का श्रवण करने से नि:संतान दंपत्ति को गुणवान पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है.

शताब्दियों पूर्व गिद्धौर राज रियासत के तत्कालीन चंदेल राजा जय मंगल सिंह द्वारा स्थापित यह दुर्गा मंदिर सूबे में अपना विशेष स्थान रखता है. इस इलाके के लोग यहां के दशहरे को देखने अन्य राज्यों से भी आते हैं. पुरानी परंपरा व पौराणिक विधान के अनुरूप तांत्रिक विधि से पूजा संपादन आज भी यहां देखने को मिलता है. नवरात्रि के समयावधि में प्रतिदिन यहां हजारों श्रद्धालु श्रद्धा-विश्वास के साथ माँ दुर्गा की प्रतिमा का दर्शन एवं पूजा-आराधना करने आते हैं.

काली है कलकत्ते की, दुर्गा है पतसंडे की’ ये सदियों पुरानी कहावत आज भी चली आ रही है. दशहरा के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है. कहा जाता है कि राज घराने के जमाने में मेला के दौरान गिद्धौर महाराज दर्शन के लिए जनता के बीच उपस्थित होते थे. इस मौके पर ब्रिटिश राज के बड़े-बड़े अधिकारी भी महाराजा के मेहमान हुआ करते थे. जो मेला में भी शिरकत करते थे. कालांतर में इस मेले को चंदेल वंश के उत्तराधिकारियों ने जनता को सुपुर्द कर दिया तब से लेकर आज तक पौराणिक परंपरा के अनुसार क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा इस मंदिर में पूजा का आयोजन कराया जाता है.

तांत्रिक रीति से पूजन विधि अपने-आप में एक अलग परम्परा रही है. मनोकामना सिद्धि एवं सदैव जागृत रहने वाले इस मंदिर में आश्विन मास के नवरात्री के समय स्थानीय सहित दूर-दराज के श्रद्धालुओं का वृहद संख्या में आगमन होना इस बात का दर्शाता है कि यहाँ के दुर्गा पूजा का महत्व चारो ओर प्रसिद्ध है. श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें यहाँ तक खींच लाती है. धार्मिक विश्वास, श्रद्धा एवं समर्पण के भाव से श्रद्धालु उलाई नदी में स्नान कर नदी किनारे से ही दंडवत देते हुए मंदिर की परिक्रमा कर माता की पूजा-अर्चना करते हैं. दंडवत देने का यह रिवाज शताब्दियों से चला आ रहा है. इसकी शुरुआत कब से हुई इसकी सटीक जानकारी किसी के भी पास उपलब्ध नहीं है.

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