सामा चकेवा : मिथिला में भाई-बहन के पवित्र व मजबूत रिश्ते के प्रतीक का पर्व

सोनबरसा/सीतामढ़ी (मुकुन्द कुमार अग्रवाल) : सामा चकेवा बिहार में मैथिली भाषी लोगों का यह एक प्रसिद्ध त्यौहार है और यह त्योहार सोनबरसा प्रखण्ड में बड़े ही हर्षोउल्लास व धार्मिक माहौल में मनाया जाता है. भुतही, दोस्तिया, कन्हौली, सोनबरसा के पटेल नगर व अन्य इलाकों के विभिन्न जगहों पर सामा-चकेवा के विभिन्न गीतों के मधुर बोल के बीच बेहद ही पवित्र व उत्साह के वातावरण में मनाया जाता है. भाई-बहन के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध को दर्शाने वाला यह त्योहार अक्टूबर व नवम्बर माह के बीच प्रारम्भ होता है.

इसका वर्णन पुरानों में भी मिला है. सामा-चकेवा की एक कहानी है. यूं तो ग्रामीण महिलाएं व युवतियां विभिन्न जगहों पर अपने-अपने तरीके से भी कहानियां सुनाती व गढ़ती है. परन्तु सभी का भाव एक ही होता है. कहते हैं कि सामा कृष्ण की पुत्री थी. जिनपर अवैध सम्बन्ध का गलत आरोप लगाया गया था, जिसके कारण सामा के पिता कृष्ण ने गुस्से में आकर उन्हें मनुष्य से पक्षी बन जाने की सजा दे दी. लेकिन अपने भाई चकेवा के प्रेम और त्याग के कारण वह पुनः पक्षी से मनुष्य के रूप में आ गयी.

‘चुगला करे चुगली बिलइया करे म्यांउ म्यांयु चुगला के जीभ नोची, नोची खाउ’, ‘सामा खेले गेलली चकवा भईया के अंगना, कनिया भोजी देलिन लुलआईन’…. सामा चकेवा की ये गीत इस खेल त्योहार की प्रसिद्ध गीत है और इस गीत के बोल भी इन दिनों सोनबरसा के आस-पास संध्या को काफी दूर-दूर तक सुनाई दे रहा है. सोनबरसा पटेल नगर वार्ड 7 के अध्यक्ष गोदावरी कुमारी पटेल, ग्रामीण अनिल पटेल, परीक्षण साह, भुटा साह, गजाधर पांडे, रामबाबू साह बताते हैं कि इस त्योहार को देख कर ऐहसास होता है कि बेहद ही तेज रफ्तार जिंदगी व आर्थिक युग मे भी आज भी एकजुट परिवार व रिश्तों की डोर कहीं ज्यादा मजबूत है. यही भारतीय व ग्रामीण संस्कृति की पहचान है.

शाम होने पर युवा महिलायें अपनी संगी सहेलियों की टोली में मैथिली लोकगीत गाती हुईं अपने-अपने घरों से बाहर निकलती हैं. उनके हाथों में बांस की बनी हुई टोकरियां रहती हैं. टोकरियों में मिट्टी से बनी हुई सामा-चकेवा की मूर्तियाँ, पक्षियों की मूर्तियाँ एवं चुगिला की मूर्तियाँ रखी जाती है. मैथिली भाषा में जो चुगलखोरी करता है उसे चुगिला कहा जाता है. मिथिला में लोगों का मानना है कि चुगिला ने ही कृष्ण से सामा के बारे में चुगलखोरी की थी.

सामा खेलते समय महिलायें मैथिली लोक गीत गा कर आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं. भाभी ननद से और ननद भाभी से लोकगीत की ही भाषा में ही मजाक करती हैं. अंत में चुगलखोर चुगिला का मुंह जलाया जाता है और सभी महिलायें पुनः लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घर वापस आ जाती हैं. ऐसा आठ दिनों तक चलता रहता है. यह सामा-चकेवा का उत्सव मिथिलांचल में भाई -बहन का जो सम्बन्ध है उसे दर्शाता है.

सामा चकेवा पर्व में पहले महिलाएं व युवतियां खुद से सामा बनाती थी, परन्तु अब बदलाव आ गया है. अब ज्यादा तर महिलाएं व युवतियां बाजार से रेडीमेड खरीद कर ले आती हैं. यह उत्सव कार्तिक शुक्ल पक्ष से सात दिन बाद शुरू होता है और आठ दिनों तक यह उत्सव मनाया जाता है और नौवे दिन बहने अपने भाइयों को धान की नयी फसल की चुरा एवं दही खिला कर सामा-चकेवा के मूर्तियों को तालाबों में विसर्जित कर देते हैं. जबकि ग्रामीण इलाकों में काफी जगहों पर महिलाएं व युवतियां इसे जूते हुए खेतों में विसर्जित कर देते हैं.