कई मायनों में दूसरी जगहों से अलग है मुंगेर में दुर्गा पूजा आयोजन 

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मुंगेर (सुनील जख्मी) : मुंगेर में दुर्गा पूजा का आयोजन बाकी स्थानों से बिलकुल जुदा है. कुछ तो खास है इस आयोजन में जो इसे इतना लोकप्रिय बनाता है. आइए इस बारे में जानते हैं.
मुंगेर की बड़ी दुर्गा: 
दुर्गा पूजा का प्रमुख आकर्षण बड़ी दुर्गा महारानी जी हैं. माँ की महिमा इतनी अपरंपार है कि दूर दूर से श्रद्धालु माँ की एक झलक पाने को बेताब रहते हैं. माँ का सुंदर रूप शांत होने के साथ-साथ चंचल भी है. जहाँ एक ओर माँ क्रुद्ध नज़र आती हैं, अगले ही क्षण माँ मुस्कुराती प्रतीत होती हैं. माँ के चेहरे से जो कान्ति उत्पन्न होती है उससे माँ को देखते रहने का मन करता है.  माँ की विशाल आंखें हमें माँ का चेहरा भी जी भर कर निहारने नहीं देती. अगले ही क्षण हमारी आंखें भर आती हैं और हम नतमस्तक हो जाते हैं. सबसे बड़ी बात, माँ के दरबार में सबका स्वागत है, लोग जात-धर्म से ऊपर उठ कर माँ के आगे शीश झुकाते हैं. माँ की तस्वीर अगर आप अहमदाबाद या विशाखापत्तनम के किसी दुकान में देख लें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि माँ सिर्फ मुंगेर में ही नहीं, सारे भारत में पूज्य हैं.
भक्तिमय वातावरण: 
जहाँ बाकी जगहों पर दुर्गा पूजा सप्तमी से मनाई जाती है (कई जगह तो सिर्फ विजयादशमी मनाई जाती है या फिर वो भी नहीं), मुंगेर में पहले ही दिन से दुर्गा पूजा का अनुभव होने लगता है. सुबह-सुबह दुर्गा सप्तशती के पवित्र श्लोकों से लोगों की नींद खुलती है. हर घर में माता की पूजा होती है. मंदिर में तो कलश स्थापन के दिन से ही भीड़ उमड़ जाती है. हमारे यहां तो प्रथमा को भी ‘पहली पूजा’ कहते हैं और ‘पट खुल जाना’ जैसा कुछ नहीं होता.  भक्तों के लिए पट तो हमेशा खुला रहता है.
हर पूजा समिति का अपना मंदिर: 
मुंगेर में सभी पूजा समितियों का अपना मंदिर है जिसमें माँ की पूजा होती है. दुर्गा पूजा के समाप्त हो जाने के बाद भी भक्त माँ के मंदिर में पूजा करते रहते हैं. मुंगेर में चंदे की राशि को पंडाल पर खर्च करने के बजाये पूजा-पाठ, साज-सज्जा, प्रसाद एवं विसर्जन यात्रा आदि पर खर्च करने की कोशिश की जाती है.
बड़ी संख्या में प्रतिमाएं: 
अगर देखा जाए तो मुंगेर में २०० से कम प्रतिमाएं नहीं बनतीं. लोग इतनी प्रतिमाएं देख नहीं पाते इसलिए मुख्य प्रतिमाएं ही देखते हैं. जैसे आप मुंगेर आए हैं तो शादीपुर में घुसें, बड़ी माँ, छोटी माँ के साथ 8—10 अन्य प्रतिमाएं देख लीं. सिर्फ शादीपुर में ही 5 प्रतिमाएं स्थापित होती हैं. यहां कि हरेक प्रतिमा सोने-चांदी के जेवरों से लदी होती हैं. कई पर अस्त्र-शस्त्र भी सोने-चांदी के होते हैं.
परंपरागत पूजा: 
मुंगेर की दुर्गा पूजा में परंपरा का निर्वाह किया जाता है. मुंगेर में बनने वाली सभी दुर्गा-काली प्रतिमाएं हर साल एक जैसी बनती हैं. आप किसी को किसी एक साल की तस्वीर दिखाकर यह नहीं पूछ सकते कि अच्छा बताओ यह किस साल की तस्वीर है? बड़ी माँ की प्रतिमा 400 साल से बनती आ रही है. कई मूर्तिकार बदले पर मॉं के स्वरुप में रत्ती भर का परिवर्तन नहीं हुआ. कई बड़े-बुजुर्गों के मुंह से एक सत्य-कथा सबने सुनी होगी.
‘मुंगेर में एक बार कर्फ्यू लगा था, दुर्गा पूजा चल रही थी, पर विसर्जन करने जाये कौन! सो पुलिस के जवानों ने बड़ी माँ को ट्रक पर लादकर विसर्जन करने की सोची. सैकड़ों लोग प्रयास करते रहे पर माँ टस से मस नहीं हुयीं. अंत में हारकर प्रशासन ने परंपरानुसार 32 कहार बुलाए, जिन्होंने विधिवत विसर्जन किया.’
12 दिनों का मेला: 
जहां बाकी स्थानों पर 3—4 दिनों का मेला लगता है, मुंगेर में यह पहली पूजा से द्वादशी तक 12 दिनों का होता है. सबसे ज्यादा भीड़ षष्ठी से एकादशी तक रहती है.
प्रसिद्ध रावण वध: 
दशमी की शाम को पोलो मैदान में हर वर्ष रावण वध का आयोजन होता है, जिसे देखने हजारों की संख्या में लोग उपस्थित होते हैं. रावण वध के ठीक बाद आतिशबाजी का कार्यक्रम होता है. रावण वध के बाद भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि सिर्फ खड़े रहो, खुद—ब—खुद किला के बाहर पहुंच जाओगे. दूसरी ओर प्रमुख प्रतिमाएं अपने स्थान से निकल कर शहर भ्रमण को निकल जाती हैं.
विसर्जन शोभा यात्रा: 
रात भर शहर भ्रमण के पश्चात प्रतिमाएं १ नंबर ट्रैफिक पहुंचती हैं जहां से सभी कतारबद्ध होकर सोझी घाट की ओर प्रस्थान करती हैं. बड़ा महावीर स्थान में हर प्रतिमा की आरती होती है. अमूमन हर प्रतिमा के आगे एक अखाड़ा होता है जो अस्त्र-शस्त्र एवं पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं. विसर्जन के दौरान बहुत ज्यादा भीड़ होती है जिसे नियंत्रित करने को प्रशासन चौकस रहता है. रस्ते में कई संस्थाएं शिविर लगाकर जनसेवा करती हैं. एकादशी की सुबह बड़ी माँ की भव्य आरती हो जाने के बाद ही बाकी प्रतिमाएं आगे बढ़ती हैं. दिन भर विसर्जन के ढोल-नगाड़ों के बीच अगली सुबह होती है जमालपुर की प्रतिमाओं के नाम. लोग प्रमुख चौराहों पर भीड़ लगाकर खड़े रहते हैं. रंग-बिरंगे विद्युत बल्बों की रौशनी से सजी ट्रॉलियों पर सवार होकर जब माँ की प्रतिमा का मुंगेर आगमन होता है तो लोग बस देखते ही रह जाते हैं.
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