जीवन में अनुष्ठान का विशेष महत्व: संत जीयर स्वामी

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लाइव सिटीज डेस्क/(पुष्कर पांडेय) : भागवत वेद और उपनिषद का सार है. यह भगवद् रस का सागर और वैष्णवों की भक्ति का उद्गम ग्रंथ है. यह पंचम वेद और भगवान के श्रीमुख से निकला हुआ मानव कल्याणकारी अमृत वचन है. ये बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ में प्रवचन करते हुये कही. श्री स्वामी ने भागवत ग्रंथ की महत्ता बतलाते हुए कहा कि यह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का घर है. भगवद् तत्वों को प्रकाशित करने वाला अलौकिक पुंज है.
यह जन्म को सुधारने वाला, मानव जन्म कोे संस्कारित करने वाला एवं मृत्यु को मंगल बनाकर सद्गति देने वाला है. यह आध्यात्मिक रस का वितरक है और काल व मुक्ति के भय से मुक्ति दिलाने वाला है. श्रीमद् भागवत का अर्थ बतलाते हुए उन्होंने कहा कि ‘श्री’ शब्द ईश्वर भक्ति एवं महालक्ष्मी का सूचक है. ‘मद्’ का मतलब सर्वगुण संपन्न है. ‘भा’ का अर्थ प्रकाश, ‘ग’ का मतलब है ज्ञान व वैभव और ‘त’ तेज का सूचक है. ‘महा’ से अभिप्राय भक्ति ज्ञान, दया, वैराग्य, करूणा और महानता से है. ‘पुराण’ वह है जो पुस्तक, लेखन में ‘पुरातन’ हो लेकिन श्रवण और अध्ययन में ‘नवीनता’ का भास कराये.
कथा शब्द पर चर्चा करते हुये श्री जीयर स्वामी ने कहा कि जिन शब्दों, घटना, इतिहास एवं चरित्र को सुनने एवं पढ़ने के बाद परोपकार सरलता दया, ज्ञान एवं वैराग्य का भाव पैदा हो वह कथा है उन्होंने धार्मिक आयोजनों का महत्ता बतलाते हुये कहा कि ये सभ्यता, संस्कृति और संस्कार को उचित दिशा में प्रवाह देते हुये संरक्षित करते हैं. यज्ञ या धार्मिक आयोजनों के वक्त कुछ लोगों को विकास नजर आता है, लेकिन आयोजनों के पूर्व और समापन के बाद वैसे लोग विकास को भूल जाते हैं. विकास से अभिप्राय सिर्फ आर्थिक संपन्नता सड़क, पुल और विद्यालयों का निर्माण नहीं होनी चाहिये बल्कि मानव कल्याण के निमित्त सभी सांस्कारिक कार्यक्रमों का आयोजन भी हो, जिससे आपसी सौहार्द, सुख-शान्ति, उल्लास एवं पारम्परिक संस्कारों में वृद्धि हों.
मानव जीवन के लिये यह आवश्यक है. विश्व के सभी देशों और धर्मों में आयोजनों की परम्परा है. विकास के साथ-साथ सभी सकारात्मक आयोजन आवश्यक है अन्यथा सिर्फ विकास निराशा पैदा कर विनाश का कारण बनने लगता है. आयोजनों में समय व अनुशासन का काफी महत्व है. नास्तिक व्यक्ति भी पवित्र स्थल से प्रभावित हो जाता है. जीवन में कुतर्क से सदैव बचे क्योंकि कुतर्क का न कोई मानक होता न स्वतंत्र सत्ता.
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