दिलों में मुहब्बत के फूल खिलाने से मिलता है ख़ुदा!!

मोटरसाइकिल फुल स्पीड में दौड़ाकर शब-ए-बारात के दिन टशनबाज़ अल्लाह तआला को ढूंढने सड़कों पर निकलते हैं. लगभग 5-6 सालों से यह सिलसिला ज़ारी है.

शब-ए-बारात मनाने का लड़कों ने यह नया तरीका निकाला है. न मालूम किस तरह की इबादत है यह? फ़रज है, सुन्नत है, सुन्नत ग़ैरमुअकदा है, नफली इबादत है,  कॉली इबादत है? अगर सुन्नत समझकर करते हैं ऐसा, तो यह सुन्नत तो न हुई! आप हुजूर सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के जमाने में मोटरसाइकिल तो क्या साइकिल भी नहीं थी. रसूल सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने न तो शब-ए-बारात के दिन पटाखे फोड़े,  न सड़कों पर घोड़े दौड़ाए, न हलुआ पकाया, न हलुआ खाया. किसी भी तरह का पाखंड तो रसूल सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के अख़लाक़ में किरदार में था ही नहीं.

क्या सोचते हैं ये लड़के कि मोटरसाइकिल कि रफ्तार तेज करकर सीधा चौथे आसमान में पहुंच जाएंगे अल्लाह से मुसाफा करने? आसमान का तो मालूम नहीं दो गज ज़मीन के अंदर ज़रूर पहुंच जाएं और पहुंचा दें किसी बेकसूर को. पता नहीं इन्हें अल्लाह मिलता है कि नहीं, मगर अपनी घटिया हरकतों से दिल्ली की सड़कों पर जाम ज़रूर लगा देते हैं. कोई ऐम्बुलेंस में मरीज़ अस्पताल ले जाया जा रहा हो वो भी वक्त पर न पहुंचने पर ‘अल्लाह पुर’ पहुंच जाएं. कॉलसेंटर की गाड़ियाँ जाम में आधी रात को फंसी रहती हैं. उनमें काम करने के बाद थककर आ रहे कर्मियों का नींद से, थकन से, बुरा हाल हो रहा होता है. कोई मरे या जिए इनकी बला से. इन्हें अपनी तफरी से मतलब है.

इन नालायकों के कारण पूरे मुस्लिम समुदाय के लोग बदनाम होते हैं.

अल्लाह तो एक नूर की तरह हर शय में मौजूद हैं. उन्हें ढूंढने के लिए किसी कोने में जाने की, टशनबाज़ी की, पाखंड की ज़रूरत नहीं है. वो आसमान में हैं, ज़मीन में हैं, वो फूलों में हैं, कलियों में हैं, परिंदे- चरिंदों के दिलों में हैं, इस मिट्टी की खूशबू में हैं वो पानी में हैं. वो पानी से वजू करते हैं, मिट्टी से तयम्मुम करते हैं, ज़मीन पर सर झुकाते हैं तब मिलता है खुदा. यहीं अपने घर में, अकड़ने से बिगड़ने से नहीं, झुकने से मिलता है ख़ुदा. किसी को तकलीफ देने से नहीं, तकलीफ में मदद करने से खुश होता है ख़ुदा.

शोर मचाने, हो-हल्ला करने से नहीं, सादगी अपनाने से, मुहब्बत करने से मिलता है ख़ुदा. वो ज़ुबान का, आवाज़ का मोहताज़ नहीं है, शब-ए-बारात में ही नहीं, वो हर दिन, हर पल तुम्हारे सामने मौजूद है.  तुम्हें देखता है, परखता है. इसलिए अपने अख़लाक़ से किरदार से दूसरों का दिल जीतो, सलीके की ज़िंदगी जियो. छतों पर रोशनी जलाने से नहीं, दिलों में मुहब्बत के फूल खिलाने से मिलता है ख़ुदा.

(मेहजबीं दिल्ली में रहती हैं और सामाजिक सरोकार से जुड़ी विभिन्न समसामयिक मसलों पर फेसबुक पोस्ट के जरिये बेबाकी से अपनी राय रखती हैं. प्रस्तुत विचार मेहजबीं के फेसबुक पोस्ट से साभार )