गुनाहों से निजात पाने का महीना है रमज़ान

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फुलवारी शरीफ : राजधानी पटना के मनेर खानकाह के गद्दीनशीं सय्यद शाह तारिक एनायतुल्लाह फिरदौसी साहेब ने रमजान माह की फजीलतें बयां करते हुए कहा की बेशक रमजान का महिना रहमतों और बरकतों की बारिश का महीना है लेकिन खुदा पाक इस महीने में बन्दों की हर गुनाह को माफ़ी भी दे देता है. यह महीना गुनाहों की माफ़ी और अपने आगे की जीवन में गुनाह न करने का संकल्प लेने का भी सीख देता है. साफ दिल से इबादत का महीना अब गुजरने हो है. इसी माह मानव जीवन को सही राह दिखाने आसमां से उतरी थी कुरान शरीफ. यह महीना गुनाहों से निजात का महीना है.
गलत कामों से बचें-
रोजा सिर्फ भूखे, प्यासे रहने का नाम नहीं बल्कि गलत कामों से बचाना भी है.  इसका मतलब हमें खुद को शारीरिक और मानसिक दोनों तरीकों से नियंत्रण में रखना है. इस मुबारक महीने में किसी तरह के झगड़े या गुस्से से ना सिर्फ मना किया गया है बल्कि किसी से गिला-शिकवा है तो उससे माफी मांग कर समाज में एकता कायम करने की सलाह दी गई है. रोजा के महीने में किसी भी तरह का नशा करना हराम है और  इसके लिए सख्त पाबंदी भी है. रोजा के दौरान किसी भी स्त्री को गलत नजर से नहीं देख सकते, यहां तक कि अपनी बीवी को भी. रमजान के पाक महीने में रोजेदार को खुद भी खुश रहना चाहिए और दूसरों को भी खुश रखना चाहिए. इससे घर में बरकत होती है.
सच्चाई व ईमानदारी का पालन करें-
पाक महीने में रोजा रखने वाला हर व्यक्ति सच्चाई व ईमानदारी का पालन करते हुए वक्त का पाबंद भी हो जाता है. यह महीना वक्त की कीमत का अहसास भी कराता है. यह महीना वर्ष भर का मार्ग दर्शक महीना भी कहलाता है.  इस महीने में अल्लाह अपनी रहमतों के दरवाजे खोलता है और बरकतों की बारिश करता है. अल्लाह उन लोगों से मोहब्बत करता है जो वक्त शिनाजी पर यकीन रखते हैं. अल्लाह ने हर इबादत का वक्त मुकर्रर किया है और वक्त पर की गयी इबादत का सवाब अल्लाह ने अफजल बताया है.
पाबन्दी से नमाज़ पढ़ें – 
पांचों वक्त की नमाज का अपना समय है. अगर उसे उसी समय अदा किया जाए तो उसका सवाब अलग है और वक्त गुजरने के बाद कजा पढ़ी जाये तो उसका भी सवाब है मगर उतना नहीं है. इसलिए अल्लाह ने अपने बंदों को वक्त शिनाजी होने पर जोर दिया है. इस महीने में मुसलमान अल्लाह पाक से गुनाहों की माफी मांगते हैं तो अल्लाह उन्हें बख्श देता है. रोजा ही एक ऐसी चीज है जिसका सवाब खुद अल्लाह देगा. उन्होंने रोजा रखने व नमाज की पाबंदी पर जोर दिया. इसी तरह अल्लाह ने रोजा का वक्त भी मुकर्रर किया है. रोजा अल्लाह की बड़ी इबादतों में से है. इसके रखने से अल्लाह बेहद खुश होता है और रोजे अफतार के वक्त मांगी गयी दुआ को कबूल फरमाता है. इसलिए रोजा अफतार के समय उसकी बारगाह में दुआ मांगनी चाहिए. इस माह में जितनी भी इबादत की जाये तो कम है.
सय्यद शाह तारिक एनायतुल्लाह फिरदौसी
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