22 अगस्त को बिहार समेत पूरे देश में मनाया जायेगा ईद-उल-जुहा, गुजरात में दिखा चांद

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पटना : ईद-उल-जुहा (बकरीद) 22 अगस्त को पूरे देश में मनाया जायेगा. इसका एलान इमारत-ए-शरिया व खानकाह-ए- मुजिबिया ने रविवार की देर रात की. इससे पहले बारिश के चलते बकरीद का चांद देखे जाने के एलान के लिए इमारत-ए-शरिया व खानकाह-ए-मुजिबिया सहित कई धार्मिक एदारों में उलेमाओं की घंटों बैठक चलती रही. रात करीब 11 बजे बकरीद का चांद देखे जाने का एलान किया गया. इमारत-ए-शरिया के नाजिम मौलाना अनिसुर्रहमान कासमी व खानकाह-ए-मुजिबिया के प्रबंधक मौलाना मिन्हाजुद्दीन कादरी ने बताया कि गुजरात मे हांसोठ, करमालि, खरोड और पाणोली में चांद देखा गया.

इस्लाम का पवित्र त्योहार बकरीद जिसे ईद-उल-अज़हा और ईद-उल-ज़ुहा भी कहा जाता है. ईद-उल-ज़ुहा के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग बकरे या किसी अन्य पशु की कुर्बानी देते हैं. इस्लाम में इस दिन को फर्ज़-ए-कुर्बान का दिन कहा गया है.

क्यों मनाई जाती है क़ुरबानी

इस्लाम में ईद-उल-ज़ुहा को कुर्बानी का दिन माना जाता है. बकरीद मनाने के पीछे एक कहानी प्रचलित है. इब्राहिम अलैह सलाम नामक एक व्यक्ति थे उनकी कोई संतान नहीं थी. काफी मन्नतों से उन्हें एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा. काफी मन्नतों के बाद मिला ये बेटा हजरत इब्राहिम अलैह सलाम को बेहद प्यारे थे. एक दिन इब्राहिम को एक सपना आया. सपने में अल्लाह पाक ने उनसे सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा. उन्हें समझ में आ गया कि अल्लाह इस्माइल को मांग रहे हैं.

अल्लाह के हुक्म को न मानना उनके लिए मुमकिन नहीं था, लिहाजा वे बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए. कुर्बानी देते समय उनकी ममता न जागे इसके लिए इब्राहिम ने आंखों पर पट्टी बांध ली, जैसे ही वे बेटे की बलि देने लगे, तभी किसी फरिश्ते ने छुरी के नीचे से इस्माइल को हटाकर एक मेमने को रख दिया. कुर्बानी के बाद जब उन्होंने आंखों से पट्टी हटाई तो देखा इस्माइल सामने खेल रहा है और नीचे मेमने का सिर कटा हुआ है. तब से इस पर्व पर जानवर की कुर्बानी का सिलसिला शुरू हो गया.

बकरे के अलावा दी जाती है ऊंट या भेड़ की कुर्बानी

बकरीद के दिन बकरे की जगह ऊंट या भेड़ की भी कुर्बानी दी जा सकती है. हालांकि भारत में ऐसा देखने को बहुत कम मिलता है. वहीं कुर्बानी देने के भी कुछ नियम बनाए गए हैं. दुर्बल, बीमारी से ग्रसित व अपंग जानवर की कुर्बानी नहीं दी जाती. एक साल या डेढ़ साल से कम उम्र के जानवर की बलि देना भी गलत माना जाता है. कुर्बानी हमेशा ईद की नमाज के बाद की जाती है. इसके बाद मांस के तीन हिस्से होते हैं. एक खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए. ईद के दिन कुर्बानी देने के बाद गरीबों को दान पुण्य भी करना चाहिए.

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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है

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