रहमतों और बरकतों का महीना है रमजान, इसके उद्देश्यों को समझें

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तनवीर अहमद

लाइव सिटीज डेस्क : रमज़ान शुरू होने ही वाला है और लोगों में इसकी तैयारियां भी ज़ोर-शोर से शुरू हो चुकी हैं. रमज़ान के आगमन पर लोगों में जिस प्रकार का जोश पैदा हो जाता है और घरों में खुशियों का जो माहौल फैल जाता है वो किसी से ढकी-छुपी हुई बात नहीं है. लेकिन रमज़ान शुरू होने और अफ्तारी तथा सेहरी के समय दस्तरख्वान पर अच्छे-अच्छे पकवान की व्यवस्था करने के चक्कर में हम ये भूल ही जाते हैं कि आखिर रमज़ान का असल उद्देश्य क्या है और हम इस से किस प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं.

हम भूल जाते हैं कि अल्लाह ने रमज़ान इस लिए नहीं बनाया है कि दिन भर भूखे रहा जाये और अफ्तारी में स्वादिष्ट पकवान का सेवन किया जाये. हम भूल जाते हैं कि अल्लाह ने क़ुरआन शरीफ में लिखा है कि “ऐ लोगो जो ईमान लाये हो तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किये गए जिस प्रकार तुम से पहले नबियों की उम्मतों पर फ़र्ज़ किये गए थे ताकि तुम में तक़वा का गुण पैदा हो.” (अल-बकरा : 183) क़ुरआन की इस आयत में स्पष्ट रूप से बता दिया गया है कि रोज़े का असल उद्देश्य तक़वा को अपनाना है.

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अब हमें ये समझने की ज़रुरत है कि आखिर ये तक़वा है क्या. इसका अर्थ है अपनी इच्छाओं को दबाना या खुद को उन कामों से रोकना जिस के लिए अल्लाह ने मना किया है. इस प्रकार देखा जाये तो रमज़ान का महीना अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है और इस एक महीने में अगर कोई सच्चे दिल से और पवित्रता के साथ लगातार रोज़ा रखता है तो उसको अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना आ जायेगा. चूंकि एक व्यक्ति के सामने खाने-पीने का सभी सामान रखा हुआ है, और उसको भूख भी लगी हुई है, लेकिन वो उसकी तरफ हाथ भी नहीं बढ़ा रहा है. पत्नी सामने बैठी हुई है लेकिन प्रबल इच्छा के बावजूद उसके साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित नहीं कर रहा है.

इसका साफ़ मतलब है कि उसने अपनी इच्छाओं को “अल्लाह” की ख़ुशी के लिए कुर्बान कर दिया है. और ऐसे ही व्यक्ति के लिए अल्लाह ने कहा है कि “इंसान का हर अमल उसके लिए है सिवाए रोज़े के कि वो केवल मेरे लिए है और मैं ही इस का बदला दूंगा. और रोज़ा एक ढाल है फिर जब तुम में से किसी का रोज़े का दिन हो तो वो गन्दी बात न करे, न हंगामा करे, और अगर कोई उसे गाली दे या लड़ाई करे तो कह दे कि मैं रोज़ेदार हूँ.”

(सहीह बुखारी : 1904, सहीह मुस्लिम : 1151) इस से स्पष्ट होता है कि अल्लाह तआला रोज़ेदारों को कितना पसंद करते हैं. इस बात का सबूत अल्लाह के रसूल मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का वो हदीस भी है जिस में उनहोंने कहा कि “तीन लोगों की पुकार अल्लाह ज़रूर सुनता है- न्यायप्रिय बादशाह, रोज़ेदार और पीड़ित की बद्दुआ.” (मसनद अहमद : 2/305, सहीह इब्ने हब्बान : 10/386)
अल्लाह से निकटता प्राप्त करने और अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने के अतिरिक्त भी रोज़ा रखने के कई लाभ हैं जिस पर लोगों का कम ही ध्यान जाता है. स्वास्थ से सम्बंधित इसके इतने फायदे हैं कि कई डॉक्टर रमज़ान के बाद भी अपने मरीजों को रोज़ा रखने का निर्देश देते हैं. साईंस से भी ये साबित हुआ है कि मोटापा, माईग्रेन, एलर्जी, ब्लड प्रेशर, जोड़ों के दर्द आदि में रोज़ा रखना बहुत लाभदायक सिद्ध होता है.

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तनवीर अहमद

इसके अतिरिक्त रोज़ा हमें भूखे रहने वालों की भूख का अहसास दिलाता है, ग़रीबों की मदद का सबक़ देता है और सामाजिक सौहार्द का पाठ पढाता है. लेकिन बद-किस्मती से मुसलमानों ने क़ुरआन और सुन्नत के स्पष्ट निर्देशों को छोड़ दिया है और केवल ‘रस्मो-रिवाज’ की पैरवी कर रहे हैं. अल्लाह ने कहा है कि रमज़ान के पवित्र महीने में गरीबों, मोहताजों और ज़रूरतमंदों को अफ्तार और सेहरी में शामिल करें लेकिन इस निर्देश का पालन करने की जगह अमीर और प्रतिष्ठित लोगों को ही बुलाया जाता है. ऐसा करने वालों को समझ लेना चाहिए कि वो केवल दिखावा कर रहे हैं और रमज़ान के असल उद्देश्य को कलंकित कर रहे हैं.

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