हिन्दू और इसाई धर्म में क्या है शुभ-अशुभ

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लाइव सिटीज डेस्क : हर धर्म में शुभ अशुभ की मान्यता है. संसार का हर धर्म शुभ-अशुभ और पाप-पुण्य के इर्द-गिर्द घूमता रहता है. शुभ और अशुभ व पुण्य और पाप की समस्या कर्म-फल-सिद्धांत पर आधारित हैं. जीव यदि अशुभ कर्मों की ओर प्रेरित होता है तो इसके पीछे उसकी अल्पज्ञता, अज्ञान होता है.

ईसाई नीतिशास्त्र में पाप या अशुभ पर विचार करते हुए कतिपय महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं. इस संसार का निर्माण परमेश्वर ने किया, किन्तु संसार में सर्वत्र पाप ही पाप है. यदि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की और ईश्वर शुभ और सर्वशक्तिमान है तो सृष्टि में शुभ ही शुभ होना चाहिए.

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ईसाई धर्म में ‘ईश-चिंतन’ के संदर्भ में उक्त विचारधारा प्राप्त होती है. ईश्वर परम शुभ है. अतः उस पर पाप या अशुभ का आरोपण नहीं किया जा सकता. बाइबिल में काम-वासना को पाप या अशुभ की संज्ञा दी गई है और उसका शैतान कहा गया है. ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर ने मनुष्य को कर्म की स्वतंत्रता प्रदान की है. अत: अच्छे-बुरे या पाप-कर्म और पुण्य कर्म का चयन मनुष्य स्वयं करता है.

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ग्रह शांति के लिए जड़ी का उपयोग

यदि हम हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार विचार करें तो सगुण ईश्वर का अवतार अशुभ के विनाश के लिए ही होता है. जैसा कि गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं ‘जब-जम अधर्म का विस्तार होता है मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतार ग्रहण करता हूं.’ बाइबिल में ईसा मसीह को ‘पुत्रेश्वर’ कहा गया है. परमेश्वर के पुत्र के रूप में ईसा मसीह संसार के पापों को दूर करने के लिये-ही धरती पर आए थे.