आज तरावीह की नमाज़ से रमजान शुरू, कल पहला रोजा

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लाइव सिटीज डेस्क : माह-ए-रमजान शुरू हो चुका है. रोजा रखने का मतलब भूखा-प्यासा रहना नहीं बल्कि अपने आप को सभी तरह की बुराईयों से रोकना है. रोजा रखने के बाद मुसलमान को बुरी बातों की तरफ जाना तो दूर उनके बारे में सोचना भी गुनाह है. दूसरों के बारे में बुरा सोच कर, झूठ या तकलीफ पहुंचाने वाली बात कहकर पीठ पीछे बुराई करके रोजे नहीं रखे जा सकते. रोजा तमाम बुराईयों को खत्म करने की जड़ है. इस महीने में हर मुसलमान को चाहिए कि वह रोजा रख कर ज्यादा से ज्यादा कुरआन पढ़ें, अच्छे काम करें, गरीबों की सहायता करें और किसी को तकलीफ न पहुंचायें.

तरावीह की नमाज़

आम दिनों में मुसलमान 5 नमाजें पढ़ता है, मगर रमजान के पवित्र महीने में 6 नमाजें अदा की जाती हैं. छठी नमाज को नमाजे तरावीह कहते हैं, जिसके बारे में है कि जिस व्यक्ति ने सारा दिन रोजा रखा और रात को तरावीह की नमाज अदा न की तो उसका रोजा पूरा नहीं होता. तरावीह की नमाज अल्लाह ने मुसलमानों को ईनाम के तौर पर दिया है. हर मुसलमान के ऊपर रोजे फर्ज किए गए हैं. चांद की पुष्टि होने के बाद सभी मुसलमान तैयार होकर रात की नमाज में आ जाते हैं.

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रोजाना की नमाज के बाद रमजान के महीने की एक और नमाज होती है -तरावीह. यह बीस रकात के साथ पढ़ी जाती है. इस नमाज में इमाम पूरे कुरआन को बगैर देखे हुए नमाज में खड़े होकर पढ़ता है और उसके पीछे खड़े होने वाले हजारों मुसलमान उसे सुनते हैं.

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तराबी की नमाज दो-दो रिकात 20 रिकात पढ़ी जाती है, जो लगातार 1 माह तक चलती रहती है. इस नमाज में रोजा रखने या ना रखने वाले बच्चे, बू़ढ़े और नौजवान मस्जिदों में उपस्थित होकर तराबी पढ़ते हैं. इस्लाम के पांचवें स्तंभ में से एक रमजानुल मुबारक की फजीलत में बयान किया है कि एक नेकी के बदले 70 गुना नेकी का शबाब माह-ए-रमजान में मिलता है. इसी तरह कलामें पाक की एक हर्फ पढ़ने वाले और सुनने वालों को 70 गुना हर्फ पढ़ने और सुनने का शबाब मिलता है, जिसको हासिल करने के लिए मर्द मोमिन नौजवान और बच्चे मस्जिदों में एशा की नमाज में जम जाते हैं. वहीं औरते तराबी की नमाज को अपने घरों में अदा करती हैं.

रहमतों और बरकतो का महीना

इस महीने में अपने हर बंदे के लिए रहमत का दरवाजा खोल देता है .रमजानुल मुबारक का महीना साल में एकबार रहमत व बरकत की बारिश के साथ ही गुनाहों की मगफिरत का सौगात लेकर आता है. हजरत पैगम्बर साहेब ने इसी माह कुरान शरीफ नाजिल कराया ताकि इसकी तिलावत से मुल्क और पूरे समाज में शांति अमन भाईचारे को मजबूती मिले. रमजान का महीना सब महीनों से अफजल महीना माना जाता है. इस महीने को रहमतों और बरकतो का महीना भी कहा जाता है. इस माह-ए-मुबारक में हर इबादत का सवाब सत्तर गुणा बढ़ा कर दिया जाता है. रोजदारों पर हर वक्त अल्लाह की रहमत बरसती है.

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