रमजान में खोल दिए जाते हैं जन्नत के दरवाजे

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लाइव सिटीज डेस्क/फुलवारी शरीफ :  हाजी मो. जनेशार ने रमजान में रोजा रखने और उसके सवाब के बारे में कहा की रोजे की हालत में कान, आँख, पेट समेत शरीर के सभी अंगों से बुराईयों से बचना जरुरी होता है तभी रोजा मुकम्मल माना जाता है. रोजा केवल भूखे रहना और शाम में इफ्तार करके तरावीह पढ़ना नहीं बल्कि हर तरह के बुरे कर्मो से दूर रहने और साल भर इसी सीख पर जीवन गुजारने की प्रेरणा दिलाता है. रमजान बारह महीनों में सबसे अधिक बरकत वाला महीना है.
उन्होंने कहा कि रोजा की हालत में कुरआन की कसरत के साथ तिलावत करना चाहिए. नमाज और कुरान पढ़ने से रोजेदारों को सुकून मिलता है और गुनाहों की मगफेरत होती है. उन्होंने कहा कि अल्लाह ताला ने रोजा हर मोमिन पर फर्ज करार दिया है. रोजा को जानबूझकर छोड़ने वाले आजाएब के हकदार होंगे. रोजेदारों की मुंह की खुशबू अल्लाह को बहुत पसंद है. इस महीने में शैतानों को कैद कर दिया जाता है. यह ऐसा मुबारक महीना है, जिसमें जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं. परंतु वह लोग बड़े बदकिस्मत हैं, जो सिर्फ भूखे प्यासे रहते हैं और इसे ही रोजा समझकर संतुष्ट रहते हैं.
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हाजी मो. जानेशार
वास्तव में वह रोजे की हकीकत को नहीं जानते और उसके सवाब से वंचित रह जाते हैं. भूखे प्यासे रखकर इबादत करने वाले अल्लाह के बहुत करीब होते हैं और उनकी हर दुआ कबूल कर ली जाती है. कितने ही रोजेदार ऐसे हैं, जिन्हें उनके रोजे से भूख प्यास के अलावा कुछ नहीं मिलता.
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जो रोजेदार रोजे की हालत में भी झूठ, चोरी, कालाबाजारी आदि गुनाहों से तौबा नहीं करता उन्हें अल्लाह की रहमतो से महरूम ही रहना पड़ता है. रोजे की हालत में जहां गुनाहों से परहेज लाजिम है, वहीं बेफायदा और फालतू कामों से बचना जरूरी है. रोजे के जरूरी आदाब में यह बात भी शामिल है कि जिस तरह रोजेदार खाने-पीने से मुंह बंद रखता है, उसी तरह वह दूसरे गुनाहों को भी पूरी तरह छोड़ दे.