ज़कात देना टैक्स नहीं इबादत है

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तनवीर अहमद

लाइव सिटीज डेस्क : ज़कात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक स्तंभ है. क़ुरान की कई आयतों में ज़कात का उल्लेख नमाज़ के साथ आया है, जिस से ज्ञात होता है कि जिस प्रकार नमाज़ मुसलमानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण इबादत है उसी प्रकार निसाब वालों पर ज़कात निकालना भी आवश्यक है. एक तरफ जहां नमाज़ पढ़ने से रूह को सुकून मिलता है और आपके अन्दर की बुराई ख़त्म होती है, वहीं ज़कात देने से न केवल आपके आस पास के ग़रीबों की परेशानियां दूर होती हैं, बल्कि आपके माल की पवित्रता भी बढ़ती है.

अल्लाह तआला ने क़ुरान में इस्लामी हुकूमत को संबोधित करते हए फ़रमाया है- “आप उन के मालों में से सदका ले लीजिये, जिसके द्वारा आप उनको पाक-साफ़ कर देंगे और उनके लिए दुआ कीजिये, नि:संदेह आपकी दुआ उनको इत्मीनान पहुंचाएगी. और अल्लाह तआला खूब सुनते हैं और खूब जानते हैं.” (सूरह तौबा: 103)

दरअसल ज़कात फ़र्ज़ इबादत है जो पिछले सभी नबियों और उन की शरीयतों में भी एक धार्मिक कार्य के रूप में जारी रहा. कुछ लोग ज़कात को टैक्स समझते हैं, लेकिन ऐसा सोचना पूरी तरह से गलत है. क़ुरान की एक आयत में इस बात का इशारा मिलता है कि ज़कात तथा सदक़ात हुकूमत का कोई टैक्स नहीं जो आम हुकूमतें अपनी सरकार चलाने के लिए वसूल करती हैं, बल्कि इस का मकसद खुद माल वालों को गुनाहों से पाक-साफ़ करना है.

इस प्रकार देखा जाये तो ज़कात व सदक़ात से दो फायदे होते हैं, एक तो खुद माल वालों का है कि इसके द्वारा वो गुनाहों से और दौलत की लालच से पैदा होने वाली नैतिक बुराईयों से पाक हो जाते हैं, दूसरा फायदा ये है कि इस के द्वारा कौम के कमज़ोर लोगों की परवरिश होती है जो किसी लाचारी या मजबूरी के कारण अपनी आवश्यकताएं पूरी नहीं कर पाते हैं, जैसे- यतीम बच्चे, विधवा औरतें, अपाहिज मर्द तथा औरतें और फ़क़ीर तथा लाचार व्यक्ति.

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जहां तक ज़कात देने का प्रश्न है तो, हर माल पर ज़कात फ़र्ज़ नहीं है बल्कि, कुछ विशेष माल पर ज़कात निकाला जाता है जैसे कि सोना, चांदी, कारोबारी माल, उपजाऊ ज़मीन की पैदावार, खान से निकलने वाली चीज़ों या कोई पुराना खज़ाना जो ज़मीन से निकला हो. और इसी प्रकार उस जानवर पर भी ज़कात निकालना फ़र्ज़ है जो कारोबार के लिए हों. लेकिन इसके लिए भी एक निसाब है, यानि एक सीमा से ज्यादा माल होने पर ही ज़कात निकालना फ़र्ज़ होता है.

उदाहरण के रूप में चांदी के लिए दो सौ दिरहम निसाब तय है, जिस का वज़न हिन्दुस्तान में 52 तोला 6 माशा 5 रत्ती होता है, और सोने के लिए 20 मिस्क़ाल का निसाब तय है जो हिंदुस्तान में 7 तोला 6 माशा वज़न के बराबर होता है. इसी प्रकार कारोबारी माल और दूसरी चीज़ों पर भी सोना और चांदी के निसाब के अनुसार ही कीमत तय कर के ज्यादा माल होने पर ज़कात निकालना फ़र्ज़ होता है. साथ ही ज़कात उस माल पर ही निकालना फ़र्ज़ है जो आपके पास 1 वर्ष पूरा कर चुका है.

क़ुरान में ज़कात न देने वालों पर कठोर अज़ाब की बात कही गयी है. सूरह तौबा की आयत 34-35 में अल्लाह तआला ने कहा है- “जो लोग सोना चांदी जमा करके रखते हैं और उस को अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते आप उनको एक दर्दनाक अज़ाब की खबर सुना दीजिये, जिसका सामना उस रोज़ करना होगा जब इस सोने-चांदी को दोज़ख की आग में पहले तपाया जाएगा फिर इस सोने-चांदी से इन लोगों की पेशानियों (माथा), उनकी करवटों और उनकी पीठ को दाग़ दिया जाएगा और बताया जायेगा कि ये वही माल है जिसको तुम अपने वास्ते जमा करके रखे हुए थे, तो लो अपने जमा करने का मज़ा चखो.”


इस सम्बन्ध में बुखारी शरीफ़ कि एक हदीस में कहा गया है कि- “अल्लाह तआला ने जिस को माल दिया और उस ने ज़कात अदा न की तो कयामत के दिन उसके माल को बड़ा ज़हरीला गंजा सांप बना दिया जायेगा और उसकी गर्दन में लपेट दिया जायेगा, जो उसके दोनों जबड़े नोंचेगा और कहेगा कि मैं ही तेरा माल हूँ और मैं ही तेरा खज़ाना हूँ.” (बुखारी शरीफ: 1,88)

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इसलिए मुस्लिम भाईयों को चाहिए कि अगर वो निसाब को पूरा करते हैं तो ज़कात ज़रूर निकालें, इस में कोई कोताही न करें और इसको धार्मिक कार्य और इबादत ही समझें. ऐसा करके वो अपनी आखिरत की ज़िन्दगी को तो बेहतर बनायेंगे ही, दुनिया में भी उनका सम्मान बढ़ेगा और रूह को शान्ति भी मिलेगी.