OMG! इन भारतीय मंदिरों में होती है बिना सिर वाले भगवान की पूजा, जानें आखिर क्यों होता है ऐसा

लाइव सिटीज डेस्क : भारत में कई सारे ऐसे मंदिर जो रहस्यमयी हैं और कई सारी कहानियां उनसे जुड़ी हैं. आज हम आपको कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां लोग बिना सिर वाले भगवान की करते हैं पूजा. जी हां आपने सही सुना भारत के इन मंदिरों में बिना सिर की मूर्तियों की पूजा की जाती है. अगर देखा जाए तो हमारे हिन्दू धर्म में खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती है लेकिन इन मंदिरों में लोग इसे नहीं मानते हैं.

दरअसल, झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर रजरप्पा नाम की जगह है. इस स्थान की पहचान धार्मिक महत्व के कारण बहुत प्रसिद्ध है क्योकि यहां पर एक मंदिर है जिसका नाम छिन्न मस्तिका मंदिर है.

असम में मां कामख्या मंदिर को सबसे बड़ी शक्तिपीठ माना जाता है और इसके साथ ही दुनिया की दूसरे नंबर पर शक्तिपीठ रजरप्पा छिन्नमस्तिका मंदिर है. आपको जानकर और भी ज्यादा हैरानी होगी कि यहां पे भक्त बिना सिर वाली देवी मां की पूजा करते हैं. केवल सिर से नीचे के भाग की पूजा लोग करते हैं.

इसे लेकर एक कहानी है कि एक बार मां भवानी अपनी दो सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने आई थीं. स्नान के बाद सहेलियों को इतनी तेज भूख लगी कि भूख से बेहाल उनका रंग काला पड़ने लगा. उन्होंने माता से भोजन मांगा. माता ने थोड़ा सब्र करने के लिए कहा, लेकिन वे भूख से तड़पने लगीं.

सहेलियों के विनम्र आग्रह के बाद मां भवानी ने खड़ग से अपना सिर काट दिया, कटा हुआ सिर उनके बाएं हाथ में आ गिरा और खून की तीन धाराएं बह निकली. दो धाराओं को उन्होंने उन दोनों की ओर बहा दिया. बाकी को खुद पीने लगी तभी से मां के इस रूप को छिन्नमस्तिका नाम से पूजा जाने लगा.

दूसरा मंदिर उत्तरप्रदेश की राजधानी से 170 किमी दूर प्रतापगढ़ के गोंडे गांव में स्थित है. यह मंदिर लगभग 900 साल पुराना है. अष्टभुजा धाम मंदिर की मूर्तियों के सिर औरंगजेब ने कटवा दिए थे. शीर्ष खंडित ये मूर्तियां आज भी उसी स्थिति में इस मंदिर में संरक्षित की गई हैं.

ASI के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मुगल शासक औरंगजेब ने 1699 ई. में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था. उस समय इसे बचाने के लिए यहां के पुजारी ने मंदिर का मुख्य द्वार मस्जिद के आकार में बनवा दिया था. जिससे भ्रम पैदा हो और यह मंदिर टूटने से बच जाए. मुगल सेना इसके सामने से लगभग पूरी निकल गई थी, लेकिन एक सेनापति की नजर मंदिर में टंगे घंटे पर पड़ गई. फिर सेनापति ने अपने सैनिकों को मंदिर के अंदर जाने के लिए कहा और यहां स्थापित सभी मूर्तियों के सिर काट दिए गए.

आज भी इस मंदिर की मूर्तियां वैसी ही हाल में देखने को मिलती हैं. मंदिर की दीवारों, नक्काशियां और विभिन्न प्रकार की आकृतियों को देखने के बाद इतिहासकार और पुरातत्वविद इसे 11वीं शताब्दी का बना हुआ मानते हैं.

इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी क्षत्रिय घराने के राजा ने करवाया था. मंदिर के गेट पर बनीं आकृतियां मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर से काफी मिलती-जुलती हैं. इस मंदिर में आठ हाथों वाली अष्टभुजा देवी की मूर्ति है. वहीं, गांव वाले बताते हैं कि पहले इस मंदिर में अष्टभुजा देवी की अष्टधातु की प्राचीन मूर्ति थी. 15 साल पहले वह चोरी हो गई. इसके बाद सामूहिक सहयोग से ग्रामीणों ने यहां अष्टभुजा देवी की पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाई.

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