शनि के प्रभाव में भी सत्कर्म करें, यह मंगलकारी होगा: जीयर स्वामी

आरा (पुष्कर पांडेय): नीति की बीज से उत्पन्न फल सुखदायी नहीं बल्कि दुःखदायी होता है. दुष्टों का प्रेम सदैव कष्टकारी होता है क्योंकि यह स्वार्थ की बदनीयती के कारण सुकून नहीं लेने देता. उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ में प्रवचन करते हुये कही. श्री जीयर स्वामी ने भागवत कथा के तहत मंगलाचरण की व्याख्या करते हुये कहा कि परमात्मा को न तो मंगल की कामना है और न विजय की.



संसारी लोगों के मंगल में अमंगल और जय में पराजय छुपा रहता है, इसलिये मंगलाचरण में भगवान से निर्विघ्न कामना पूर्ति हेतु प्रार्थना करते हैं. उन्होंने कहा कि अनीति और अधर्म से अर्जित वैभव देखने में सुन्दर और प्रभावी जरूर प्रतीत होता है लेकिन वह अर्जित करने वाले को स्थायी आनन्द और शांति नहीं देता बल्कि कष्ट देता है. उन्होंने कहा कि आज धर्म का व्यवसायीकरण होने लगा है जिससे बचने की जरुरत है.

उन्होंने मानव जीवन का सदुपयोग और उपभोग की चर्चा करते हुये कहा कि यदि कल्याण चाहते हैं, तो सांसारिक भोग-वासना के बंधन से उचित समय से बाहर निकल कर भगवान के चरणों में अनुराग लगाना चाहिये न कि जीवन पर्यन्त अर्थ और वासना की कामना में लिप्त रहे. उन्होंने कहा कि जिस पर आपका वश न हो उसकी चिंता न करें. जो नहीं जानने योग्य है, उसे नहीं जानना ही जानना है. मानव का जीवन चंचल जल के बुलबुले के समान है. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मृत्यु याद रखनी चाहिये. इससे भटकाव में कमी आती है और अनीतिपूर्ण कार्याें के क्रम में मन के अन्दर कचोट भी पैदा होती है.

उन्होंने कहा कि तीर्थ यात्रा कम भी हो लेकिन शव यात्रा में भाग लेनी चाहिये. सत्संग, सत्कर्म और सत्धर्म मनुष्य के भीतर और बाहर प्रकाश करता है. जैसे घर के चौखट पर रखा हुआ दीया घर और बाहर दोनों ओर प्रकाश करता है. उन्होंने कहा कि शनि देव को शत्रु नहीं मानना चाहिये बल्कि शनि के प्रभाव के वक्त सत्कर्म के साथ रहें. वह मंगल का कारण बनेगा. शनि देव के योग से ही कोई भी व्यक्ति तपस्वी, योगी, धनी, राजा और विशेष प्रभावशाली बनता है.

जहां भक्ति सत्संग एवं सत्कर्म का प्रभाव होता है, वहां शनि सहयोगी बनकर मदद करते हैं.