भारत का अनोखा शिव मंदिर जहां महादेव की नहीं होती है पूजा, वजह है बेहद दिलचस्प

लाइव सिटीज डेस्क : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि (बोलचाल में शिवरात्रि) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस दिन का त्यौहार का लोगों के लिए बहुत ही महत्व होता है. महाशिवरात्रि के त्यौहार लाखों शिव भक्तों द्वारा हर साल मनाया
जाता है. इल साल 13 फरवरी को शिवरात्रि मनाया जा रहा है.

आइए जानते महादेव के कुछ मंदिरों के बारे में. भगवान शिव औघड़ दानी कहलाते हैं तो उनके मंदिर अनोखे ही होते हैं. जैसे उत्‍तराखंड का हथिया देवाल शिव मंदिर जहां दर्शन होते हैं पर पूजा नहीं.

यहां पूजा है अनिष्‍टकारी
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 70 किलोमीटर दूर एक कस्बा है थल जिससे लगभग छह किलोमीटर दूर एक गांव सभा बल्तिर है. यहां भगवान शिव का एक प्रसिद्ध मंदिर हथिया देवाल स्‍थित है. इस मंदिर को अभिशप्त शिवालय कहा जाता है. हालाकि इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और इसकी अनूठी कारीगरी को सराहते हैं, लेकिन यहां भगवान की पूजा नहीं करते. क्‍योंकि ऐसी मान्‍यता है कि जो कोई भी इसकी पूजा करेगा, उसके लिए यह
फलदायक नहीं होगी, बल्‍कि इसकी दोषपूर्ण मूर्ति का पूजन अनिष्टकारक भी हो सकता है. इस कारण इस मंदिर के दर्शन के लिए आने वाले लोग उसकी चौखट को नहीं लांघते. मंदिर में भक्‍त मन्नतें तो मांगते हैं, पर कोई कभी भी यहां एक लोटा जल तक नहीं चढ़ाता है और न ही पुष्‍प अर्पित करता है.

मंदिर के नाम का रहस्‍य

ऐसा सुना जाता है कि ये मंदिर एक हाथ से बना हुआ है. कई पुराने ग्रंथों, अभिलेखों में इसका जिक्र करते हुए बताया गया है कि एक समय यहां राजा कत्यूरी का शासन था. उसे स्थापत्य कला से बहुत लगाव था और वो इस मामले में अपने दौर के दूसरों लोगों से आगे रहना चाहता था. इसके लिए उसने एक बेहद कुशल कारीगर से मंदिर का निर्माण करवाना शुरू किया और एक रात में उसे तैयार करने के लिए कहा. इस कारीगर ने केवल एक हाथ से रातों रात मंदिर को तैयार कर दिया. राजा चाहता था
कि कोई और ऐसा मंदिर न बनवा सके. इसलिए उसने उस कारीगर का एक हाथ कटवा दिया. इसके बाद उस मूर्तिकार कहीं गायब हो गया और बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिला.

इसलिए नहीं होती पूजा

बाद में जब पंडितों ने मंदिर में स्‍थापित शिवलिंग को देखा तो पाया कि शिवलिंग का अरघा उल्टी दिशा में बना हुआ है. इसके बाद उसे ठीक करने का बहुत प्रयास किया गया पर अरघा सीधा नहीं हुआ. तब पंडितों ने घोषणा की कि जो कोई भी इस शिवलिंग पूजा करेगा, उसके लिए यह फलदायक नहीं होगी. इसकी पूजा से भारी कष्‍ट भी हो सकता है, क्‍योंकि दोषपूर्ण मूर्ति का पूजन अनिष्टकारक भी हो सकता है. बस इसी के बाद से इस मंदिर में पूजा नहीं की जाती है.

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मिलो कभी शाम की चाय पे...फिर कोई किस्से बुनेंगे... तुम खामोशी से कहना, हम चुपके से सुनेंगे...☕️

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