वट सावित्री व्रत: ताकि सदा रहें सुहागन

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लाइव सिटीज डेस्क  (विमलेन्दु कुमार सिंह)  हिंदू परंपरा में विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसमें अग्नि को साक्षी मान युवक—युवती दांपत्य जीवन में प्रवेश करते हैं और जन्म-जन्मांतर तक संग-संग जीवन व्यतीत करने का एक दूसरे को वचन देते हैं. इसलिए हिंदू महिला के लिए ‘सदा सुहागन रहो’ की कामना से बढ़कर दूसरा कोई आशीर्वचन नहीं. हिंदू धर्म में पति के सुदीर्घ जीवन एवं अपने सुहाग की रक्षा की कामना को समर्पित कई व्रत हैं.

‘करवा चौथ और ‘तीज’ के अलावा ‘वट—सावित्री’ इनमें एक है. हिंदू धर्म में प्रत्येक पर्व त्योहार एवं व्रत किसी न किसी धार्मिक आख्यान एवं लोककथाओं से जुड़ी होती हैं.

वट—सावित्री भी सुप्रसिद्ध सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ी हुई है, जिसमें यमराज सत्यवान का प्राण हरने के बाद सावित्री को सुहागन होने का वरदान दे अपना वचन निभाने के लिए निष्प्राण पड़े सत्यवान के शरीर में प्राण का संचार करने को विवश होते हैं और सावित्री फिर से सुहागन हो जाती हैं.

कब मनाते हैं
वट सावित्री की पूजा ज्येष्ठ अमावस्या के दिन होती है. अंग्रेजी तिथि के अनुसार इस वर्ष यह 25 मई 2017 दिन गुरूवार को मनाया जा रहा है.

वट वृक्ष की पूजा क्यों
हिंदू परंपरा में बरगद के पेड़ को त्रिदेव की मान्यता प्राप्त है. ऐसी मान्यता है कि बरगद में जगत के निर्माता गुरू ब्रह्मा, जगत के पालक विष्णु और जगत के संहारक महेश तीनों का वास है.

ऐसी आस्था है कि ब्रह्मा बरगद या वटवृक्ष की जड़ों में, विष्णु इसके तने में और शि‍व शिरोभाग में विराजमान हैं. यही वजह है कि लोग इस विश्वास के साथ बरगद या वटवृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करते हैं कि इससे ईश्वर उनकी हर मनोकामना पूर्ण करेंगे.

 

एक मान्यता यह भी है कि वटवृक्ष का जीवन सुदीर्घ होता है. इसकी काया विशाल होती है और इसकी जीवटता इसे हर परिस्थिति में जीवित रखती है. महिलाएं वटवृक्ष की पूजा कर अपने पति के लिए भी वटवृक्ष जैसा ही सौभाग्य और जीवन की कामना और याचना करती हैं. महिलाएं अपने पति के लंबे जीवन एवं अपने अक्षुण्ण सुहाग का वरदान पाने के लिए बरगद या वटवृक्ष का पूजन करती हैं.

एक मान्यता यह भी है कि यमराज ने जब सत्यवान का प्राण हर यमलोक की राह पकड़ी तो मृत शरीर वटवृक्ष के नीचे ही था. ऐसी मान्यता है कि प्राण का पुनर्संचार होने तक वटवृक्ष ने ही मृत शरीर की रक्षा की थी. समस्त घटनाक्रम के साक्षी भी रहे इसलिए व्रती महिलाएं वटवृक्ष का पूजन कर उनके प्रति आभार और कृतज्ञता व्यक्त करती हैं.

सावित्री सत्यवान की कथा
भद्र देश के राजा अश्वपति शादी के पश्चात काफी दिनों तक नि:संतान रहने के कारण दु:खी रहा करते थे. उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक जपतप किया. उनकी साधना से प्रसन्न हो देवी सावित्री प्रकट हुईं और उन्हें पुत्री का वरदान दिया. राजा को पुत्रीरत्न की प्राप्त हुई. उन्होंने आभारपूर्वक कन्या का नाम सावित्री ही रखा.

सावित्री सर्वगुणसंपन्न कन्या थी. वक्त बीतता रहा और कन्या विवाह योग्य हो गई तो राजा चिंतित रहने लगे. एक बार उन्होंने पुत्री को स्वयं ही वर तलाश करने की जिम्मेवारी दे दी. सावित्री पति की तलाश में एक वन में जा पहुंचीं. वन में उनकी मुलाकात साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से हुई.

द्युमत्सेन का राजपाट छीना गया था इसलिए तपोवन में रहकर ईश्वर की सेवा में रत थे. सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखा तो उनके व्यक्तित्व पर मोहित हो उन्हें पति के रूप में वरण करने का निर्णय ले लिया. यह बात ऋषिराज नारद को ज्ञात हुई. वह त्रिकालदर्शी थे.

उन्होंने राजा अश्वपति से जाकर कहा कि आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल कर दी है. सत्यवान गुणी तथा धर्मभीरू तो हैं परन्तु अल्पायु हैं. बस एक वर्ष उसका जीवन शेष है. इसके बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी.

यह जानकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया. उन्होंने अपनी पुत्री को समझाया कि सत्यवान अल्पायु हैं. उसके साथ विवाह का निर्णय उचित नहीं है इसलिए किसी और को वर के रूप में स्वीकरना श्रेयस्कर होगा. पिता के मुख से ऐसा सुन सावित्री ने अपने पिता से कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का वरण बस एक बार ही करती हैं.

मैं सत्यवान को वर के रूप में मन से स्वीकार कर चुकी हूं और यह फैसला अटल है. इस निर्णय को सुनने के बाद विधि—विधान के साथ दोनों का पाणिग्रहण संस्कार कर दिया गया और सावित्री पति व सास-ससुर की सेवा में रत हो गईं. वक्त बीतते देर न लगी. नारद मुनी का वचन सावित्री को परेशान करने लगा था. जब उसने जाना कि पति की मृत्यु की तिथि नजदीक आ गई है तब तीन दिन पूर्व से ही उसने उपवास शुरू कर दिया.

नारद द्वारा घोषित निश्चित तिथि को सावित्री ने पितरों का पूजन किया. नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल के अंदर के लिए निकल पड़े. सावित्री को होनी का भान था. इसलिए उसने सास-ससुर की अनुमति प्राप्त कर पति के साथ ही जंगल के लिए निकल पड़ी.

सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ गए. वृक्ष पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असह्य पीड़ा शुरू हो गई. वह व्याकुल हो वृक्ष से नीचे उतर गए. सावित्री को यह बात समझ में गई थी कि क्या होने वाला है. उसने अपनी गोद में पति का सिर रखकर उसे लिटा लिया.

उसी समय उसकी नजर महिषारूढ़ यमराज को दक्षिण दिशा से आते देखा. जब यमराज ने सावित्री के पति सत्यवान का प्राण हर यमलोक की राह पकड़ी तो सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी और सत्यवान के सूक्ष्म रूप के साथ यमलोक जाने की जिद करने लगी. यमराज ने उसे जीवित प्राणियों के यमलोग न जाने के विधान की बात बताई.

जब सावित्री इसके बाद भी अपनी जिद पर अड़ी रही तो उसकी निष्ठा और पतिपरायणता साथ-साथ परेशानी से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से उन्होंने सावित्री से प्राणदान को छोड़कर अन्यथ कोई भी वरदान मांगने का प्रलोभन दिया. सावित्री बोली, मेरे सास-ससुर वनवासी तथा ज्योतिविहीन हैं. आप उन्हें दिव्य ज्योति प्रदान करें. यमराज ने कहा, ‘तथास्तु.’

यमराज की बात सुनकर उसने कहा – भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है. पति का अनुसरण मेरा कर्तव्य है. उसकी जिद को देख यमराज ने उसे एक और वरदान मांगने को कहा. सावित्री बोली, हमारे ससुर का राजपाट छिन गया है, उसे वे पुन: प्राप्त कर सकें, साथ ही धर्मपरायण बने रहें.

यमराज ने कहा, ‘तथास्तु.’ यह वरदान देने के बाद भी जब उन्हों ने देखा कि सावित्री पीछे-पीछे आ रही है तो उन्होंने उसे लौट जाने को कहा लेकिन वह नहीं मानी.  यमराज ने कहा कि पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो और लौट जाओ.

सावित्री ने सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांग लिया और यमराज ने बिना कुछ सोचे-समझे कह दिया, ‘तथास्थु.’ इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं तो पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है?

अब यमराज को अपनी गलती का भान हुआ. लेकिन वह तो अपनी ही तीर का शिकार हो चुके थे. ऐसे में अगर वह इन्कार करते तो झूठा साबित होते. और स्वीकार करने करने का मतलब था सत्यवान को पुनर्जीवन का वरदान.

आखिरकार उन्हें सत्यवान के मृत शरीर में फिर से जीवन का संचार करना ही पड़ा. सत्यवान फिर से जीवित हो गए. सावित्री फिर से सुहागन हो गईं.

पतिव्रता नारी ने यमराज तक को कदम पीछे हटाने को मजबूर कर दिया. यमराज ने चना के रूप में सत्यावान का प्राण सावित्री को सौंप दिया और कहा कि जाओ तुम्हारी पतिव्रत से मैं प्रसन्न हुआ.  तुमने मुझे मजबूर कर दिया. सावित्री वटवृक्ष के नीचे सत्यवान के मृत शरीर के करीब पहुंची.

सत्यवान जीवित होकर उठ बैठे. दोनों हर्षित हो अपनी राजधानी की राह पकड़ी. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि उनके माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है. उनके जीवन अब खुशियां ही खुशियां थीं.

मान्यताएं
ऐसी मान्यता है कि वट सावित्री व्रत करने और इसकी कथा सुनने से व्रती के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी के जीवन पर आया किसी भी प्रकार का संकट आया हो तो वह टल जाता है. वट सावित्री व्रत में महिलाएं यथासंभव 11, 21, 51, 101, 108 या 1008 बार कच्चा सूत हाथ में ले बरगद की परिक्रमा कर पूजा करती हैं.

महिलाएं सुबह स्नानादि के पश्चात नए या नए जैसे धुले साफ-सुथरे वस्त्र धारण करती हैं और नववधू की तरह सोलह सिंगार कर सजती—संवरती हैं.  सिर पर चुनरी धारण करती हैं. पैरों में अलता, हाथों में मेंहदी की सज्जा करती हैं. साथ ही सुहाग से जुड़ा हर श्रृंगार करती हैं. इसके बाद पूजा की थाली सजाती हैं और पास के किसी वटवृक्ष के नीचे जाकर दीप प्रज्ज्वलित करती हैं. वट वृक्ष पर जल अर्पण करती हैं और हल्दी व रोली का तिलक एवं सिंदूर व चंदन का लेप लगाती हैं.

इस व्रत में पूजन के दौरान पेड़ को फल-फूल अर्पित करने की भी मान्यता है. वटवृक्ष को बांस के पंखे से हवा भी झला जाता है और परिक्रमा कर विधि-विधान पूर्वक पूजन कार्य संपन्न किया जाता है. इसमें प्रसाद के रूप में चना ग्रहण एवं वितरण करने की परंपरा है. महिलाएं वटवृक्ष का पत्ता प्रसाद रूप अपने जूड़ा में खोंसती हैं और घर आकर व्रत का आहार एवं जल ग्रहण करती हैं.

कई स्त्रियां संध्या वेला तक निर्जला भी रहती हैं और सूर्यास्त के पश्चात फलाहार, दुग्धाहार या अन्नाहार ग्रहण करती हैं. व्रती एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि अगर आपकी शारीरिक क्षमता या कोई व्याधि या बीमारी उपवास की इजाजत न दे तो पूजा के पश्चात यथाशीघ्र समुचित आहार अवश्य ग्रहण कर लें.

जबरन उपवास फलदायी कतई नहीं होता. पूजन समाप्त होने के बाद वस्त्र, फल आदि का बांस के पत्तों में रखकर दान करना चाहिए और चने का प्रसाद बांटना चाहिए.  वट सावित्री पूजा विवाहित स्त्रियों का महत्वपूर्ण व्रत है.

वट सावित्री पूजा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्रदान करता है. स्कंद पुराण, भविष्योत्तर पुराण तथा निर्णयामृत आदि में इस व्रत का विशद उल्लेख है.