औरों के लिए घरौंदे बना पूरा करते खुद के आशियाने का सपना

सासाराम (राजेश कुमार) : शहरों में दिवाली तो गावों में लक्ष्मी पूजा के नाम से मनाया जाने वाला दीपावली पर्व आम जनजीवन में कई मायने रखता है. धन-संपत्ति में वृद्धि की आस में आम लोग आपने घरों की सफाई तो साधन सम्पन्न लोगों के लिए रंग-रोगन तक की परम्परा रही है.

मान्यता है कि धन की देवी लक्ष्मी का दिवाली के दिन ही घरों में आगमन होता है. उसके लिए पूजा भी की जाती है. लक्ष्मी के लिए घरों में मिटटी के दिए, चुकवा-चुकिया, घर मकान और भी बहुत सारे रंग बिरंगी वस्तुओं का होना शुभ माना जाता था. अब मिटटी के जींस बनाने वालों की कमी हो गयी. जो बनते भी है तो वे इतने महंगे कि आम लोग ले नहीं पाते.

हाल के वर्षों में मिटटी के जींस की अनुपलब्धता से फोम के घरौंदों का बड़े पैमाने पर चलन हो गया है. उसमे भी इस कला में सासाराम का कुछ ही परिवार पारंगत है. उन्ही में से एक न्यू एरिया वार्ड 34 के स्थायी निवासी प्रेमी खटिक का परिवार है. अक्सर भोजन के लाले पड़ने वाले भूमिहीन इस लम्बे-चौड़े परिवार में युवाओं की बाहुलता को ले पास पड़ोस के लोग पहले इन्हें गलत निगाह से देखते थे.

उस परिवार का युवा शंकर कहता है. माँ-बाप फल का रेहड़ी लगा कर हम सात भाइयों को पाला पोसा. अब हर भाई अपने श्रम और बुद्धि का इस्तेमाल कर हसी ख़ुशी से रह रहे है. दिवाली के एक पखवारा पूर्व ही हम सब फोम का घरोंदा बनाने में जुट जाते है. इस्तेमाल में आने वाला फोम बेकार की चीज माना जाता है. सालो भर उसे हम जुटाते रहते है. दिवाली में हर वर्ष दो-तीन हजार घरौंदे तैयार कर देते है. पहले इसकी मार्केटिंग की समस्या होती थी. पर आज तो यह इतना लोकप्रिय हो गया है कि लोग हमारे घर तक लेने पहुँच आ रहे है.

उस परिवार का थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा सदस्य राम बाबू कहता है कि अशिक्षित और गरीब के घर पैदा लेने वाले लोगों को अपने श्रम शक्ति पर भरोसा करना चाहिए. उम्र के अनुकूल ही हमलोगों ने अपना अपना रास्ता चुनना शुरू किया. कोई ठेला चला फल बेचता है तो कोई लेथ की मशीन चला रहा है. हमलोगों ने त्योहारी मांग को पहचाना और फोम से घरौंदा बनाने की हुनर हासिल किया. आज इस घर की बच्चियां भी घरौंदा बनाने में निपुण हो रही है. इसी के बदौलत आज वे अच्छी जिन्दगी जी रहे है.

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