जवानी की दहशतगर्दी की बुढ़ापे में मिली सजा, अब जेल में गुजरेगी बची जिंदगी

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सासाराम, राजेश कुमार: पुरानी कहावत है कि देर सवेर हर किसी को अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है. बुधवार को यहां के फास्ट ट्रैक कोर्ट से 31 वर्ष पुराने मामले में हुए फैसले ने उक्त कहावत को चरितार्थ कर दिया है. मामला तीन लोगों की हुए हत्या से जुड़ा था. जिसे अस्सी के दशक में गांव में दहशतगर्दी को चमकाने के लिए तब के लफंगों के एक गिरोह ने बेवजह तीन ग्रामीणों को गोलियों से भून कर मौत की नींद सुला दिया था.

पिछले हफ्ते सासाराम के रवींद्र मानी त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली फास्ट ट्रैक अदालत ने पांच आरोपियों को सामूहिक हत्या का दोषी करार दिया था. आज सजा के बिन्दु पर हुई सुनवाई के बाद न्यायालय ने पाचो को सश्रम अजीवन कारावास की सजा सुनाई. सजा पाने वाले तमाम बुढ़ापे में कदम बढ़ा चुके हैं. सितंबर 1987 में दिनारा थाने के भानपुर गांव में दहशत के पर्याय बने एक छुटभैये गिरोह ने गांव के ही गोबिंद दयाल सिंह के घर मे घूस कर अकेली मिली उनकी भतीजी से दुर्व्यवहार किया और विरोध करने पर उसके गले से सोने की चेन छीन ली थी.

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इसे ले गोबिंद दयाल की पंचायती बुलाने की पहल दहशतगर्दों को नागवार गुजरी. और वे मौका पाते 3 सितंबर 1987 की रात 8 बजे भानपुर साइफन के पास मिले गोबिंद दयाल और उनके मित्र शत्रुघ्न सिंह और बंशी सेठ को गोलियों से भून कर मौत की नींद सुला दिया. दहशत का आलम यह था कि इस हत्याकांड की प्राथमिकी दर्ज कराने तक की किसी ने हिम्मत नहीं जुटाया तो पुलिस ने चौकीदार हरिहर सिंह के बयान पर केस दर्ज किया.

अनुसंधान के बाद दी गई चार्ज शीट में नामित अभियुक्तों के खिलाफ सत्र वाद संख्या 24/88 के तहत तीस वर्षो तक न्यायालय में चले विचारण के बाद आज फैसला आया जिसमे भानपुर के छोटे सिंह, भीम सिंह और भूअर सिंह के अलावे सरना के रामधारी सिंह व भतपूर्वआ के शिव मंगल यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. सजा भी ऐसी कि जेल में श्रम करके काटनी होगी.

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