सासाराम : स्टेनो के संकट से जूझ रहे न्यायालयों का कामकाज लड़खड़ाया, सुनवाई प्रभावित

court
न्यायालय

सासाराम(राजेश कुमार): न्यायिक व्यवस्था में स्टेनो की भूमिका की महता क्या होती है, पूरे सिस्टम को अब पता चल रहा है जब एक-एक कर सेवानिवृत होते गए स्टेनो से मुकदमों के निष्पादन की गति प्रभावित होने लगी. अब गिनती के बचे आधे दर्जन स्टेनों के जिम्मे डेढ़ दर्जन न्यायालयों के डिक्टेशन लेने की जवाबदेही निभाने से हाथ खड़े करने लगे हैं. जाहिर है, अपने केसों की सुनवाई का दबाव बनाने वाले वकीलों को न्यायालय से एक ही जवाब मिलता है, ‘स्टेनो नहीं हैं. क्या करें’.

मिली जानकारी के अनुसार लगभग तीन दर्जन न्यायालयों वाले सासाराम सिविलकोर्ट में जिला जज, अपर जिला जज, सहायक सत्र न्यायालयों एवं सबजज कोर्ट के पीठासीन अधिकारियों के डिक्टेशन लेने के लिए स्टेनो की परम्परा चली आ रही है. खास कर केस के फैसले के लिए स्टेनो की जरूरत पड़ती है. छोटे-छोटे आदेशो को तो बेंच क्लर्क ही लिख दिया करते है. एक दशक पूर्व तक लगभग हर न्यायालयों में स्वतंत्र स्टेनो हुआ करते थे. एक-एक कर उनके सेवानिवृत होते जाने से अब स्टेनो की तादात काफी कम रह गयी है. वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर एक एक स्टेनो के जिम्मे तीन-तीन कोर्ट का प्रभार दिया गया है.

जाहिर है उनकी उपलब्धता के लिए कोर्ट पंगु बना रहता है. उसमे भी कोई स्टेनो छुट्टी चला गया तो कोर्ट के फैसले लिखाने का कम ठप्प पड़ जाता है. यहां के वरीय अधिवक्ता मित्रभान सिंह बताते है, अभी तो स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि जमानत जैसे मामलों की कुछ न्यायालय सुनवाई करने से परहेज कर रहे है. उनके पीठासीन अधिकारी स्पस्ट कहते हैं कि स्टेनो के छुट्टी से लौटने के बाद या उनकी उपलब्धता पर ही केस की सुनवाई करेंगे.

जबकि सरकार ने तमाम न्यायालयों के पदाधिकारियों को इन्टरनेट के साथ डेस्कटॉप और लैपटॉप उपलब्ध करा रखा है. कागज़ में पूरी व्यवस्था ऑनलाइन कर दी गयी है. पर इक्के-दुक्के अधिकारी ही अपने फैसले लिखने के लिए उस व्यवस्था का उपयोग करते हैं. ज्यादातर लोग इन्टरनेट और लैपटॉप को अपने घरों की शोभा बढाने के लिए ही रखे हुए है.

न्यायालय के सूत्र भी स्टेनो की समस्या को गंभीर बताते हुए कहते है कि न्यायिक दंडाधिकारी, और कुछ एसीजेएम तो खुद ही फैसले लिख लिया करते हैं पर सत्र न्यायाधीश, सीजेएम, परिवार न्यायालय, उत्पाद के विशेष न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण न्यायालयों को स्वतंत्र स्टेनो की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता. सूत्र ने स्वीकार किया कि फैसले सुनाये जाने के बावजूद काफी दिनों तक उसका नक़ल नहीं मिल पाता. इसके पीछे स्टेनो की कमी ही है.

सूत्र की माने तो इस समस्या से पटना उच्च न्यायालय को भी अवगत कराया जा चुका है. साथ ही स्थिति सामान्य बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढी जा रही है.

दो टूक कह दिया गिरिराज सिंह ने, वापस नहीं जा रहा #बेगूसराय, खूंटा #नवादा में ही गाड़े रहेंगे, चाहे जनता नकार क्यों न दे, देखिये साहेब अली की वीडियो रिपोर्ट…

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*