जी हां ! हमने खरीदी है यह सड़क

सासाराम : ये रसीद देखिये, अभी अभी काट कर गया है नगरपरिषद का कर्मी. रोजाना एक ठेला का तीन रुपए देते है. कोई मुफ्त में सड़क पर ठेला नहीं लगाते. आप जैसे गुजरें, हमें क्या. ये उक्ति थी शहर की धमनी मानी जाने वाले रौजा रोड के मुहाने वाले जीटी रोड पर शान से सब्जी का ठेला लगाये अकरम नमक युवक का जिसके चलते पैदल चलने वाले अगला कदम बढ़ने के लिए सड़क पर जगह ढूढ़ते है. निरुत्तर राहगीर के मुह से निकला शब्द ‘सड़क मांगे रास्ता’. 

सिरदर्द बनी शहर की प्रमुख सड़कें

आये दिन शहरी क्षेत्र के दो किमी जीटी रोड, आधे किमी धर्मशाला रोड व उतनी ही लम्बी रौजा रोड में शहरवासियों को भीषण जाम का सामना करना पड़ता है. कभी कभी तो सरकारी महकमा के बड़े बाबुओं की लाल बत्ती लगी गाड़ियां भी जाम में फंस राह ढूढती है. पुलिस वाले भी हर रोज उनकी होने वाली तसिली से नजरें चुराते दीखते है.

ट्रैफिक जाम को सरकारी तंत्र कसूरवार

एक अनुमान के अनुसार शहर की इन सड़कों पर साढ़े तीन हज़ार ठेला, ढाई हज़ार गुमटी व दो हज़ार ब्यवसायिक वाहन रोजाना लगाए जाते है. औसतन अस्सी मीटर चौड़ी सड़क सिकुड़ कर 20 फीट की बच जाती है. उसी में वाहन, साइकिल, रिक्सा व पैदल सभी को चलना पड़ता है. स्वाभाविक है जाम होना. बुधवार को पास के जमुहार गांव से बैंक के काम से आए विनोद सिंह ने कहा, बौलिया मोड़ से स्टेट बैंक आने में गाड़ी से उन्हें दो घंटे लगे. खीज कर कहा ‘ सासाराम आने से मर जाना अच्छा है’

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बताते है, सड़क पर व्यवसाय करने वालों से प्रतिदिन हर ठेला से 3 रुपए नगर परिषद्, 2 रुपए पुलिस व 2 रुपए स्थानीय रंगदार अवैध रूप से वसूलते है. रंगदारों के माध्यम से ही पुलिस को पैसे जाते है. हालांकि नप के कार्यपालक पदाधिकारी मनीष कुमार स्पष्ट शब्दों में कहते है, सैरात बंदोबस्ती के तहत पैसे लिए जाते है जो नप के खाते में जाता है. यह भी कहा कि जाम की स्थिति को देखते हुए ठेला के लिए वैकल्पिक ब्यवस्था की जा रही है. तकिया ओवेरब्रिज के नीचे ठेला वालों को समायोजित करने की योजना शीघ्र ही धरातल पर दिखेगी. जाम से निपटने का कार्य पुलिस को करना है ना कि नगर परिषद् को.

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