बीमार बच्चे की स्थिति थी गंभीर, परिजन और डॉक्टर इलाज से करते रहे टालमटोल

समस्तीपुर/रोसड़ा (राजू गुप्ता) : जिला फिर शर्मसार हुआ है. चिकित्सा जगत के लिए यह शर्म से डूब मरने वाली घटना है. 9 वर्षीय बच्चे की मरणासन्न स्थिति को देखकर डॉक्टर एवं परिजन उसके इलाज को टाल रहे थे जबकि उक्त बच्चे की स्थिति काफी नाजुक होती जा रही थी.

डॉक्टर उसे बस चंद घंटों का मेहमान बताते हुए इलाज से हाथ पीछे खींच रहे थे ओर कह रह थे कि मेरे वश का यह रोग नहीं हैं. वहीं परिजन भी बेहतर इलाज के लिए उसे बाहर ले जाकर पैसा खर्च करने से बचना चाह रहे थे. वे सीधे कह रहे थे कि जब बच्चा बचेगा ही नहीं तो क्यों बाहर ले जाकर रुपये बर्बाद करें. इसे ले जा रहे हैं घर, मरना ही है तो वहीं मरेगा. आपको बता दें कि यहां जिस बच्चे का जिक्र हो रहा है उसके माता-पिता जीवित नहीं हैं. अगर उसके माता-पिता जीवित होते तो क्या वह बच्चा इसी तरह उपेक्षा का शिकार होता?
मिली जानकारी के अनुसार बीमार बच्चे के चाचा और चचेरे भाई पहले कई निजी क्लिनिक के डॉक्टरों के पास इलाज के लिये लेकर गये, जहां सभी डॉक्टरों ने बच्चे की गंभीर स्थिति को देखते ही इलाज करने से मना कर दिया. परिजन सारे जगह उसे अपने कंधों पर लादकर घूमते रहे. अंत में उसे अनुमंडलीय अस्पताल लेकर आये. लाइव सिटीज संवाददाता मौके का चश्मदीद है और उसी आधार पर आपको हकीकत बयां कर रहा है. अनुमंडलीय अस्पताल में भी डॉक्टर ने उसे देखने के साथ ही जवाब दे दिया. समय कम होने का हवाला देते हुए उसे यहां से अतिशीघ्र किसी अच्छे निजी क्लिनिक में ले जाने की बात होने लगी. सरकारी स्तर पर बड़े हॉस्पिटल रेफर करने की बात कोई नहीं कर रहे थे. इस पर बीमार बच्चे के चाचा ने कहा कि 3-4 क्लिनिक से लौट कर आये हैं अब लोकल में कहां जाएं? लोगों ने उसे बेगूसराय या पटना तुरंत ले जाने की सलाह दी. पर चाचा ने रुपयों की असमर्थता बताते हुए तत्काल इस सलाह को रिजेक्ट कर दिया. चाचा की आर्थिक स्थिति को देख सरकारी सदर अस्पताल समस्तीपुर ले जाने को कहा गया. अस्पताल के लोगों से बच्चे को समस्तीपुर भेज देने का आग्रह किया गया. वहां पर जो हो, बच्चा चाहे जिए या मरे. पर यहां एक नई आफत आ गयी. जबकि एक-एक मिनट कीमती था. एम्बुलेंस चालक ही अस्पताल से नदारद था. उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ बता रहा था. 15-20 मिनट इंतजार के बाद बच्चे के चाचा ने अपने बीमार भतीजे को कंधे पर लेकर घर लौटने के लिए चल पड़े. बच्चा ने इसी समय मल त्याग दिया. आसपास खड़े लोग व अस्पताल कर्मचारी बोलने लगे कि अब तो कोई शर्त पर बच्चा नहीं बचेगा. यह सब सुन बच्चे के चाचा ने एकदम आराम से चापाकल पर बच्चे का मल साफ किया. अपना हाथ-पैर भी धोया. बिना इलाज के ही सभी ने मान लिया कि बच्चा अब नहीं बचने वाला. बच्चा की स्थिति काफी नाजुक थी.

डॉक्टर का कहना था कि इसके लिए प्रत्येक मिनट काफी कीमती है. परिजन सोच रहे थे कि क्यों इसके इलाज में रूपया बर्बाद करें जब इसके बचने की उम्मीद ही नहीं है. सभी यह सोचकर बीमार बच्चे को लेकर घर के लिए निकल पड़े कि घर पर ही बच्चा मरे तो ठीक रहेगा. लाइव सिटीज के इस प्रतिनिधि ने जब अनुमंडल अस्पताल प्रबंधन पर दवाब बनाया तो आनन—फानन में एम्बुलेंस का ड्राइवर दौड़ता—हांफता हुआ आया. किसी ने यह कहकर उसे जाकर खुद बुलाया कि एक पत्रकार वीडियो बना रहा है. रेफर किया हुआ मरीज तुम्हारे चक्कर में रूका हुआ है. इसके बाद गंभीर रूप से बीमार बच्चे को सड़क पर से अस्पताल के अंदर लाया गया. पानी का बोतल लगाकर एम्बुलेंस से समस्तीपुर के लिए रवाना किया गया. एम्बुलेंस में चढ़ाने के बाद भी कुछ कुछ कारणों से 10 मिनट रूका रहा एम्बुलेंस. 10 मिनट के बाद एम्बुलेंस समस्तीपुर के लिए चल पड़ा. डॉक्टर का कहना था कि बच्चा अचेतन स्थिति में था. बड़े अस्पताल या बड़े क्लिनिक में ही इसकी जान बचाई जा सकती है. उसके परिजनों ने बताया कि बच्चा पहले एकदम भला-चंगा था. थोड़ा बुखार आया था. मेडिकल स्टोर से सूमो टेबलेट खरीदकर उसे खिलाया गया था. दवा खाने के कुछ देर बाद बच्चा जोर-जोर से सांस लेने लगा. उसकी आवाज भी लड़खड़ाने लगी थी. स्थिति बिगड़ता देख उसके इलाज के लिए लोग घर से निकले थे. लेकिन वह अस्पताल आकर भी इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाता रहा.


दरअसल अस्पताल की व्यवस्था में काफी दोष है. अनुमंडलीय अस्पताल की भूमिका बस रेफरल अस्पताल की रह गई है. यहां सर्दी-खांसी, बुखार का इलाज एवं मलहम-पट्टी लगाने का काम ही हो सकता है. इससे ज्यादा कुछ भी अगर हो तो सीधे अन्यत्र रेफर कर दिया जाता है. रेफर के बाद नौटंकी होती है एम्बुलेंस सेवा प्राप्त करने की. रेफर के 100 केस में अगर 20 मामले में भी एम्बुलेंस की सुविधा मिल जाए तो गनीमत है. 80 रोगी अपनी व्यवस्था से रेफर किये गये स्थान पर पहुंचते हैं. जिन 20 रेफर मामलों में लोगों को एम्बुलेंस की सुविधा मिलती है वे काफी दबंग होते हैं या मेजर एक्सीडेंट के शिकार होते हैं. उनके साथ 100-50 लोगों की संख्या होती है या प्रशासन का प्रेशर होता है.


रेफर की नौबत जब आती है तो एम्बुलेंस का ड्राइवर मौके से फरार हो जाता है. अक्सर उसका मोबाइल भी स्विच आॅफ हो जाता है. तीन एम्बुलेंस हैं. दो अक्सर खराब ही रहता है. ज्यादातर एक एम्बुलेंस ही ऑन ड्यूटी रहता है. एक पेशेंट को ले गया तो दूसरा वेटिंग में रहता है.
यह घटना रविवार की शाम की है. बच्चा के मां-पिता नहीं हैं. चाचा-चाची उसका पालन पोषण करते हैं. बच्चा का नाम अभिषेक कुमार पिता स्व. राम उद्गार दास और उम्र- 9 वर्ष है. वह रोसड़ा थाना क्षेत्र के थतिया पंचायत के सहियार डीह गांव का रहने वाला है. इस मामले में लोग बस यही चर्चा करते रहे कि मानवता जहां खत्म होती जा रही है वहीं रुपये के मोह में अपने भी पराये लगने लगते हैं. गरीबी भी जीवन बचाने में बाधक बन जाता है. इस बच्चे के साथ यही हुआ है.