मिथिलांचल त्योहार पर नए दौर का असर,सामा चकेवा को फिर लगी चुगलखोर की नजर

सामा चकेवा मिथिलांचल संस्कृति पर्व मनाते हुए महिलाएं (फाइल फोटो)

समस्तीपूर: आज का युग डिजिटल होता जा रहा है. आधुनिक युग में समय तेजी से बदल रहा है. रिश्ते तो मानो फोन तक सिमट कर रह जा रहे हैं और इसका सबसे ज्यादा प्रभाव त्योहारों पर दिखाई दे रहा है. बात करें छठ के बाद होने वाले सामा चकेवा की तो इस पर्व पर भी नए दौर का प्रभाव दिखाई दे रहा है. पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ा सामा चकेवा मिथिलांचल संस्कृति की एक अलग पहचान है. भाई बहन के अटूट रिश्तों का प्रतीक सामा चकेवा छठ के समाप्ति पर शुरू हो जाता है. कई दिनों तक चलने वाली मिथिलांचल की यह परंपरा भगवान कृष्ण के पुत्र और पुत्री से जुड़ी है. वैसे बदलते वक्त के साथ मिथिला की इस संस्कृति पर भी आधुनिकता का लेप चढ़ते जा रहा है.

मैथिली भाषी लोगों का यह खास त्योहार छठ पूजा के समाप्ति के बाद शुरू होता है. सामा चकेवा भाई बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है. आठ दिनों तक होने वाले इस त्योहार को लेकर मान्यता है कि भगवान कृष्ण की पुत्री सामा को उनके दरबार के एक चुगलखोर के कारण भगवान ने चिड़िया बना दिया. चिड़िया बनने के बाद भगवान कृष्ण के पुत्र चकेवा के प्रेम और त्याग के कारण सामा को फिर से इंसानो का रूप मिला.

सामा चकेवा के पर्व पर महिलाएं सामा चकेवा की मूर्ती खरीदकर मैथिली की मान्यताओं के अनुसार टोकरी पर सजाती है. इसके साथ ही लोकगीत गाते हुए मिट्टी की चिड़िया और चुगलखोर की मूर्ती को भी बनाती हैं. आठ दिनों में चुगलखोर चुगला का मुंह जलाकर इस पर्व को अंतिम रूप दिया जाता है. वहीं, नौवें दिन बहन अपने भाई को धान की नई फसल का चूरा दही खिलाकर सामा चकेवा की मूर्ति को नदी या तालाबो में विसर्जित कर दिया जाता हैं.

मिथिलांचल की पहचान रहे इस पर्व की पहचान आधुनिकता के दौर में धूमिल होती जा रही है. रोजगार को लेकर होने वाले पलायन से अब यह पर्व सिमटता जा रहा है. लेकिन बड़ी समस्या आधुनिक जीवनशैली में सिमटता परिवार का दायरा है. समूह में होने वाला यह पर्व मिथिलांचल की महक से दूर होता जा रहा है. वैसे इस त्योहार को लेकर जिले के बाजारों में खूब खरीदारी हो रही है.