विध्वन्सकारी नहीं है महादेव आशुतोष का डमरु

शिवहर : अवश्य ही आपने भगवान शंकर की प्रतिमा को ध्यान से देखा होगा. महादेव एक हाथ में डमरु थामे रहते है. पर क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया कि ऐसा क्यो ? इस वाद्य यंत्र को धारण करने के पीछे भगवान का आशय क्या हो सकता है? क्या यह वाद्य-यंत्र भगवान शिव की मात्र शोभा बढ़ाने वाला अलंकार है ?आखिर भगवान आशुतोष के हाथ मे डमरु का क्या प्रयोजन ? क्या यह मात्र एक डुगडुगी है, जो ‘तांडव’ करते महादेव के हाथ में सुशोभित होती है? या इस डमरु का बजना किसी विध्वन्स की ओर इशारा करता है? विचारिये, भगवान शंकर मदारी तो नही, फ़िर हाथ मे डमरु क्यों थामा? उत्तर गूढ़ है और आध्यात्मिक भी.
सृष्टि की रचना और विश्व शांति के सृजन में डमरु की भूमिका-
प्राचीन समय में भारत और तिब्बत के साधु-संत नर-खोपड़ियों के ऊपरी भाग की हड्डी से डमरु के दोनों सिरों को बनाते थे. वे ऐसा इसलिए करते थे, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार हमारे मस्तक के शिरो-भाग मे ब्रह्मनाद की तरंगे निरंतर गुंजायमान रहती है, इसलिए प्रतीक के तौर पर वे नर-खोपड़ी के ऊपरी भाग से बने डमरु को बजाते थे, ताकि समस्त जन को यह संदेश पहुँच सके कि हम सबके भीतर भी महादेव (आशुतोष) का डमरु बज रहा है. यह शिव का डमरु ‘ब्रह्मनाद’ का द्योतक है, इस ब्रह्मनाद का वर्णन वेद-उपनिषद आदि सभी ग्रंथो मे गुंजायमान है-
इमे मयूखा उपसेदुरु सद:
 सामानि चक्रूस्तसराणयोतवे!
 (ऋगवेद.- 10-130-2)
अर्थात परमात्मा से सूक्ष्म तरंगे अथवा ब्रह्मनाद प्रकट हुआ, जिससे भिन्न-भिन्न पदार्थो का निर्माण आरम्भ हो गया. श्री गुरू ग्रंथ साहिब मे भी वर्णित है –
“सबदे धरती सबदे आगास,
 सबदे सबदि भइआ परगास!”
अर्थआत ब्रह्मनाद रूप शब्द से ही धरती बनी, आकाश बना सृष्टि के प्रत्येक रचना मे इसी नाद की तरंग है. संत वेमना तेलुगु भाषा मे कहते है-
  नादु नादु कूडि नामरुपं बैन!
अर्थात नाद ही इस सकल नामरूप जगत का आधार है.
वैसे तो हमारी दृष्टि किसी सुंदर दृश्य पर स्थिर होती है, परन्तु नादब्रह्म बिना सदृश्य के ही हमारी दृष्टि को केन्द्रित कर स्थिर कर देता है. वैसे तो योग-प्राणयाम के सतत प्रयत्नो द्वारा हमारे प्राण स्थिर हो पाते हैं, परन्तु नादब्रह्म बिना प्रयत्नों के ही हमारे प्राणों को स्थिरता दे देता है. वैसे तो, किसी न किसी अवलम्बन या आधार की मदद से हमारा मन या चित स्थिर हो पाता है. परन्तु नादब्रह्म बिना किसी अन्य सहारे के हमारे चित मे यह अथवा ठहराव ले आता है. यह नादरूप मे साक्षात ब्रह्म ही हमारे स्पन्दित होता है.
सारत: भगवान शिव (आशुतोष) का डमरु कोई प्रलय या विनाश की और इशारा नही करता. यह अंतर्जगत का ब्रह्मनाद है. यह प्रतीक है, शुभ, मंगलमय, दिव्य व सूक्ष्म श्रजन नवीनीकरण, विकास व उत्पति का.

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