आंधी-तूफानों से लड़ने की जुर्रत का नाम है जयललिता

पटनाः वे मेरे फ्रेंड-फिलॉसफर-गाइड ही नहीं, एक तरह से मेरे माता-पिता भी थे. जयललिता ने यह बात एमजीआर के लिए तब कही थी जब उनसे पूछा गया था कि क्या वे उनसे प्यार करती थीं. आम धारणा भी यही है कि उनके उत्थान के पीछे एमजीआर के साथ उनका अफेयर था. लेकिन, हारवर्ड में पढ़ने वाली एक स्टूडेंट चरनय कानन ऐसा नहीं मानती. उन्होंने मंगलवार की सुबह फेसबुक पर जयललिता को श्रद्धांजलि देते हुए एक शोक संदेश पोस्ट की. यह पोस्ट देखते ही देखते वाइरल हो गई. कितने लाइक्स मिले यह बात तो छोड़ ही दीजिए, इस पोस्ट को 30 हजार लोगों ने शेयर किया.

कानन अपनी पोस्ट में जयललिता के उत्थान के लिए उनकी एक क्वालिटी को श्रेय देती हैं. इस क्वालिटी का नाम उन्होंने AUDACITY लिखा है. अंग्रेजी के इस शब्द के कई अर्थ हैं. मसलन कलेजा, हिम्मत, जुर्रत और धृष्टता.

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पेश है कानन की वाइरल हुई पोस्ट का हिन्दी तर्जुमाः

जब वे ऐरातिल ओरूवन फिल्म में एमजीआर के अपोजिट नायिका बनी थीं, उनकी उम्र महज 16 साल की थी. शूटिंग के वक्त जब एमजीआर आते तो फिल्म की पूरी यूनिट तो उनके सम्मान में उठ खड़ी होती थी, लेकिन फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाली चर्च पार्क स्कूल में शिक्षित जयललिता टांग पर टांग धरे किसी किताब में डूबी रहती थीं.

उनकी इसी audacity ने कालांतर में उनके राजनैतिक करियर को परिभाषित किया. जाहिराना तौर पर जयललिता बेहद चार्मिंग और बहुमुखी प्रतिभा वाली ऐसी कलाकार थीं जो नृत्य की कई विधाओं में पारंगत थीं.

मगर जो चीज़ जाहिर न थी वह यह थी कि वे काफी पढ़ी-लिखी, हाजिर जवाब और बहुत-बहुत इंटेलीजेंट थीं. और, खास बात यह कि वे यह बात जानती थीं. उनके राजनीति की ओर खिंचते चले जाने का एकमात्र कारण एमजीआर के साथ उनका अफेयर नहीं था.

कारण था उनका हिन्दी और अंग्रेजी में साधिकार बोल पाने की क्षमता और उनकी बुद्धिमत्ता जो किसी अर्थशास्त्री से टक्कर ले सकती थी.

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जब एमजीआर का निधन हुआ तो वे जानकी रामचंद्रन (एमजीआर की पत्नी) को साइडलाइन करते हुए पार्थिव शरीर के सिरहाने दो दिन तक बैठी रही थीं. इस दौरान जानकी के लोग उन्हें धकिया कर किनारे करने की कोशिश करते रहे.

सच तो यह है कि उन्हें नोचा-खसोटा भी गया. यहां तक कि उनके पांवों को कुचला गया. लेकिन, जयललिता अपनी जगह से टस से मस नहीं हुईं. जब वे एमजीआर अंतिम यात्रा के लिए आई तोपगाड़ी पर किसी तरह चढ़ गईं तो उन्हें तमाम टीवी कैमरों के सामने धक्के मार कर नीचे फेंक दिया गया. इसी धृष्टता ने जयललिता को आने वाले समय की राजनीति में जिंदा रहने में मदद की.

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एमजीआर की मौत के बाद में अन्नाद्रमुक दो हिस्सों में बंट गई लेकिन चार साल बाद जयललिता के नेतृत्व में फिर एकाकार होकर जबर्दस्त विपक्षी पार्टी बन कर उभरी. वे प्रत्येक विपरीत स्थिति में विजेता रहीं.

वे एक गौरांग ब्राह्मण थी, एक ऐसी पार्टी में जो वर्ग-विरोधी द्रविड़ नारों के कारण पनपी थी. वे एक ग्लैमरस एक्ट्रेस थी, जिन्हें किसी भी परिभाषा के तहत सीरियसली नहीं लिया जा सकता था. सबसे बड़ी बात यह कि वे एक औरत थीं 1980 के दशक में तमिलनाडु की राजनीति में सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश कर रही थीं. और, औरत भी कैसी? अविवाहित और निपूती.

सच तो यह है कि वे कांटों भरी राह पर चल निकली थीं. वे एक ऐसे आक्सीजन विहीन चैंबर में थीं, जहां उनके हाथ और पैर बंधे हुए थे. यह उनका बड़ा करतब था कि वे इन हालात में पनप सकीं. 1989 में जब उन्होंने विधानसभा में करुणानिधि के बजट पेश करने का विरोध किया था तो सदन के भीतर ही उन्हें लगभग वस्त्रविहीन कर दिया गया था.

साड़ी ही नहीं उनके बाल भी खींचे गए थे. यहां तक कि सदन के भीतर उन पर अश्लील फब्तियां कसी गई थीं. किसी राज्य की विधानसभा में एक औरत के ऐसे रिकार्डेड अपमान की दूसरी मिसाल नहीं है.

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जयललिता अब भी टिकी रहीं. वे इस अपमान से बहुत सतर्क और सधे अंदाज़ से उबरीं. उन्होंने खुद को कपड़ों की तहों के अंदर महफूज़ कर लिया और जेवर पहनने छोड़ दिए. उन्होंने खुद को मर्द-औरत के खाने से बाहर निकाला और अपने को नया ब्रांड दे दिया. ब्रांड अम्मा, यानी मां.

कुत्सित मर्दानगी से भरे माहौल में सम्मान पाने के लिए मां के रूप से बेहतर क्या हो सकता था. लोग कहते हैं कि वे विरोधियों को कुचल देती थीं और पांव पड़ने वाले चमचों की फौज बनाती थीं. लेकिन, शायद यही एक तरीका था जिसके जरिए वे फिसलन भरी सत्ता को काबू कर सकती थीं. अगर वे ज्यादा मृदु होतीं तो फिर एयर होस्टेस भी तो बन सकती थीं!

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जयललिता ने लोकलुभावन राजनीति भी की. जब द्रमुक ने लैपटॉप के वादे किए उन्होंने टेबल फैन और मिक्सर-ग्राइंडर बांट दिए, सभी आइटमों पर अपना फरिश्ते जैसा चेहरे की फोटो चस्पा करके. उन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बना. कुछ बहुत भुगतना भी पड़ा उनको. लेकिन, यह भी सच है कि भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने वाली द्रमुक का मुकाबला जयललिता से बेहतर कोई मर्द भी नहीं कर पाता. मैंने राज्य के कुछ सिविल सर्वेंट्स से बात की है, जिनका कहना है कि जयललिता के राज में कामकाज में सबसे कम सियासी दखलंदाज़ी होती है.

आज हालत यह है कि राज्य में एक भी ऐसा नेता नहीं जो उनके छोड़े रिक्त स्थान को भरने लायक हो. यह हालत कई साल या हो सकता है कि दशकों तक बनी रहे. तब तक बनी रहेगी जब तक कोई दूसरी औरत जयललिता जितना नहीं तो उसका पसंगा ही हासिल कर ले. … मैं खुश हूं.

अब राज्य भर में जयललिता की मूर्तियां लगेंगी. कुछ पीढ़ियों बाद लोग जयललिता की मूर्ति देखेंगे. उनका सम्मान इसलिए नहीं होगा कि वे एक आदर्श पत्नी थीं, वरन् इसलिए कि वे एक सच्ची और ताकतवर नेता थीं.

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