पटना भी कमाले है : ई बिल्कुले नईका प्रयोग है

पटना : आज के ज़माने में लोग कब-कहां-क्या प्रयोग कर दें, अनुमान भी नहीं कर सकते. किसी तरह सामने वाले के ध्यान को अपने प्रयोग की ओर खींच लेना है. नियम से सही-गलत की फिक्र भी लोग कहां करते हैं. देखने वाले दूसरे सिर्फ मंद-मंद मुस्कुराते रह जाते हैं. ऐसे प्रयोग में पटना सदैव आगे रहने की कोशिश करता है.

बिलकुल नये प्रयोग के बारे में बताने के पहले आपको कुछ पुरानी यादें ताज़ी करा देते हैं. 2015 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए थे. सत्ता से बाहर लालू प्रसाद बेटों को सत्ता में लाने को नीतीश कुमार से मिले हुए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी महालहर से मुकाबले को नीतीश कुमार को भी लालू प्रसाद की जरूरत थी. कांग्रेस भी साथ आ गई थी. महागठबंधन बना था.

 

परिणाम, चुनाव में भाजपा बहुत बुरे तरीके से हारी. लालू और कांग्रेस के साथ नीतीश कुमार को फिर से सत्ता मिली. लालू के दोनों बेटे सरकार में मंत्री बन गए. बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद को जैसे ही पुनर्जीवन मिला, समर्थक भी सड़कों पर आनंद ही आनंद का इजहार करने लगे. तभी पटना की सड़क पर पीले रंग की एक एसयूवी गाड़ी चर्चा में आ गई. दरअसल, इसके नंबर प्लेट पर ऐसी क्रिएटिविटी थी कि नंबर 4169 को पहचानना कठिन था, इन नंबरों में ‘यादव’ पढ़ना बहुत आसान था. इस नंबर प्लेट को सोशल मीडिया और गूगल बाबा ने दुनिया भर में मशहूर कर दिया.

विधानसभा चुनाव में हार के बाद बिहार के भाजपा-मोदी समर्थक बहुत सदमे में थे. लेकिन, कितने दिनों तक रहते. जैसे ही सदमे से बाहर निकले, ‘यादव’ वाले नंबर प्लेट को जवाब देने का मन बना लिया. तब, पटना की सड़कों पर एक और गाड़ी नोटिस की गई. इस गाड़ी के नंबर प्लेट पर नंबर 4767 को ऐसे रंग दिया गया कि असली नंबर पढ़ना मुश्किल ‘मोदी’ पढ़ लेना आसान हो गया .

अब बिहार है, तो दादा-बॉस वाले शब्द तो चलेंगे ही. सड़कों पर और ताव से भी बोले जाने वाले ‘दादा’ शब्द का मतलब बिहार में घर वाले ग्रैंड पैरेंट नहीं होते हैं. यहां तो सड़कों पर दादा मतलब सूरजभान सिंह-अनंत सिंह जैसे लोग होते हैं. सो, गाड़ी के नंबर प्लेट पर नंबर के रूप में दादा लिखने वाले लोग सड़क चल रहे दूसरों को क्या सन्देश देना चाहते हैं, आप समझ ही गये होंगे. सो, पटना की सड़क पर नंबर 4141 को ‘दादा’ के रूप में लिखी गाड़ी भी दिखती है.

अब बिलकुल नए प्रयोग को भी जान लीजिए. सबों को पता है कि बहुत चॉइस नंबर का लोभ न हो, तो आजकल गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन नंबर शो रूम में खरीदारी के समय ही मिल जाते हैं. मतलब बिना नंबर की गाड़ी सड़क पर नहीं आती. हां, बाद में ट्रांसपोर्ट ऑफिस की जरूरी औपचारिकताओं को पूरा कर लिया जाता है. इसके लिए भी एजेंटों का बड़ा नेटवर्क है.

पर, पटना का नईका प्रयोग तो बिलकुल थेथरई ही है. महंगी बाइक है. नई है. नंबर लिखाना मुनासिब ही नहीं माना गया. जो लिखा है, वह तस्वीर में आप देख ही रहे हैं. सीधा लिख दिया गया है – आई त लिखाई. तो है न यह बिलकुल नईका, क्योंकि पटना में कमाले बहुत होता है.

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