Get Well Soon का मैसेज कैंसर मरीजों से बस इतना कहता है – बच्चा, अब तुम तो गए !

लाइव सिटीज (गुंजन सिन्हा) : फैसल अनुराग, सुकांत जी (झारखंड-बिहार के वरिष्ठ पत्रकार) और कैंसर का इलाज करा रहे सभी मित्रों और उनके हितैषियों ! क्या आपको मालूम है कि कैंसर के इलाज को कौन सी बात बेअसर कर देती है ? ये है – आपकी सहानुभूति. आपकी सहानुभूति बीमार को मरने के पहले ही मार डालती है. प्लीज, प्लीज डोंट एक्सप्रेस योर सिम्पथी.

कैंसर सिर्फ एक साधारण बीमारी है और इससे ज्यादा बुरी बहुत सारी बीमारियाँ हैं – कुछ शारीरिक, कुछ मानसिक, कुछ सामाजिक, कुछ राजनैतिक, कुछ धार्मिक, कुछ आर्थिक. और ये ढेर सारी बीमारियाँ शरीर के कैंसर से कहीं ज्यादा बुरी हैं. ऐसी ही एक बीमारी है औपचारिक/भावुक सहानुभूति. प्रकृति और प्राणी के बीच प्यार/घृणा शतरंज, रणनीतियों और चालबाजियों में एक दूसरे को मारने, शह और मात के असंख्य तरीकों में कैंसर भी सिर्फ एक तरीका है और यह बवाना, या कासगंज या काबुल या बेरोजगारी से बहुत बेहतर, बहुत दयालु तरीका है.

कोई हव्वा मत बनाइये कैंसर को. फालतू में इमोशनलाइज मत कीजिये. ‘आनंद’ पुराने जमाने की फिल्म थी. उसे बैन कीजिये और अब आनंद -2 बनाइये. इमोशनलाइज करके आप उस लूट का रास्ता बनाते हैं,  जिसका शिकार हर कैंसर मरीज हो रहा है. इलाज के नाम पर लूट. डेढ़ एमएल दवा और प्रिंट प्राइस 12 हजार. मिलती है सात हजार में, लेकिन बीमा है तो 12 हजार ही लगेंगे. दूसरी कम्पनी का लेंगे तो तीन हजार.. और ये इलाज-लूट वर्षों चलती है.

सरकार में पहुँच है और आप मदद मांगें तो महामहिम मंत्री जी सात लाख – आठ लाख अनुदान दिला देंगे. लेकिन उनका क्या जो भले गरीब हों और वहां तक पहुँच नही सकें – और हम में से 99 प्रतिशत ऐसे ही हैं. शीत लहर में एम्स परिसर में पेड़ों के नीचे रातें काटते लोगों को देख आइये. लगेगा मैं या फैसल या अरुण या सुकांत जी बहुत भाग्यशाली हैं. हमे सहानुभूति नही चाहिए. न्याय चाहिए. दर्द है तो आवाज उठाइए – सबके लिए इलाज फ्री हो,  कैंसर नियंत्रण के लिए खान पान में मिलावट रुके,  insecticides वर्जित हों, लेकिन ये आप करेंगे नहीं. बस गेट वेल सून के मुफ्तिया काहिल मेसेज भेजने तक ही औकात है हमारी.

पटना में हैं रवीश कुमार, कह रहे हैं- यहां बातचीत से चहचाहट ग़ायब है
सिद्धार्थ मल्होत्रा ने भोजपुरी भाषा का उड़ाया मजाक तो कलाकारों ने इस तरह जताया विरोध

और ये मेसेज, आपको नहीं पता, कैंसर मरीज के लिए बस एक रिमाइंदर से ज्यादा कुछ नही कि बच्चा अब तुम गए. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं. ऐसे मेसेज पर बैन लगाइए. करना है तो कुछ सार्थक करो और करने दो यार, वर्ना फालतू में बाबू मोशाय मत बनो.

(डिस्क्लेमर – गुंजन सिन्हा बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं और लाइव सिटीज ने यह पोस्ट उनके फेसबुक से शेयर कर प्रकाशित किया है.)

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*