खेती में देश भर के लिए मॉडल बना जमुई का यह गांव, मदद के लिए आगे आए सेलेब्रिटी भी…

‘खेती—किसानी देश में फायदे का धंधा नहीं रह गई है.’, कुछ यही बात बुझे मन से कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तब कही थी, जब वह मंदसौर आंदोलन के बाद किसानों को अपने उपवास में संबोधित कर रहे थे. लेकिन तब तक शायद शिवराज सिंह की मुलाकात बिहार के जमुई जिले के छोटे से गांव केड़िया के किसानों से नहीं हुई थी. अगर हुई होती तो शायद शिवराज सिंह ये बात बिल्कुल भी नहीं कहते. जी हां, ये बात सौ फीसदी सच है, केडिया गांव के किसानों ने न सिर्फ खेती को फायदे का धंधा बना दिया है, बल्कि अब दूसरे किसानों को भी राह दिखा रहे हैं.

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100 देहरी का छोटा गांव है केड़िया

गांव के किसान और जीवित माटी किसान समिति के अध्यक्ष आनंदी यादव ने लाइव सिटीज से बातचीत के दौरान बताया कि जमुई जिले का केड़िया गांव महज 100 देहरी वाला छोटा सा गांव है. गांव के किसान खेती के अलावा गाय पालकर दूध उत्पादन भी करते थे. 1957 में जमुई में श्रम भारती खादी ग्राम शुरू हुआ. गांधीवादी लोग इलाके में आने-जाने लगे और खेती-किसानी के नये-नये तरीके बताने लगे. खुद आचार्य राममूर्ति नाम के बड़े गांधीवादी आये थे. उनकी पूरी टीम गांव-गांव घूम लोगों को जैविक खेती करने की सलाह देती थी.

रासायनिक खेती का रुझान पड़ा महंगा

उस दौरान बताया जाता था कि गड्ढा खोद उसमें कूड़ा-करकट डाल दिया जाता था और उसी की खाद बनाई जाती थी. कुछ दिनों तक यह विधि खूब प्रचलन में थी. लेकिन 1964-65 आते-आते सल्फर आने लगा. बाजार से किसान सल्फर, पोटाश आदि मिलाकर खेतों में डालने लगे. 70-80 के दशक में हरित क्रांति का खूब प्रचार-प्रसार हुआ. फिर डीएपी आया. खुद कॉपरेटिव ऑफिस से रासायनिक खाद खरीदने के लिये कर्ज मुहैया कराया जाने लगा. सरकार की चलाई इस योजना से किसान रासायनिक खेती की तरफ बढ़ने लगे.

तबाह हुई जमीन की उर्वरा शक्ति

धीरे-धीरे रासायनिक खादों की मांग इतनी बढ़ गयी कि बाजार में भी बड़े पैमाने पर सप्लाई होने लगा. शुरू-शुरू में आधा किलो प्रति कट्टा रासायनिक खाद देने पर ही फायदा होने लगा. लेकिन आज स्थिति यह है कि चार किलो देने पर भी फसलों को फायदा नहीं होता. इस तरह खेत खत्म होने लगे. मिट्टी कमजोर हो गयी. मिट्टी का रस चला गया. मिट्टी नमक की तरह सूखी और भुरभुरी हो गई. हद से ज्यादा रासायनिक खाद के इस्तेमाल से खेतों में केंचुए मरने लगे, जो मिट्टी को उर्वरक बनाते थे.

समस्या से शुरू हुई समाधान की तलाश

लेकिन असल समस्या शुरू हुई 2003 से. जब देश में यूरिया और डीएपी का उत्पादन गिरने लगा. गिरते उत्पादन से कालाबाजारी शुरू हुई और यूरिया और डीएपी के भाव आसमान छूने लगे. किसान परेशान होने लगा क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल की वजह से फसल उत्पादन गिरने लगा था. जबकि लागत बढती चली जा रही थी. इसके बाद मजबूरी में किसानों ने दूसरे विकल्पों की तलाश की.

जीवित माटी किसान समिति ने बदले हालात

जवाब मिला, नालंदा जिले के गांव साहिलचक में. जहां पर किसान जैविक खेती के जरिए लागत घटाकर उत्पादन बढ़ा चुके थे. गांव के कुछ किसानों ने जाकर वहां से जैविक खेती करने का तरीका सीखा. इसके बाद गांव के किसानों की मदद के लिए स्वयंसेवी संगठन ‘ग्रीनपीस’ आगे आया. ग्रीनपीस के नेतृत्व में किसानों ने ‘जीवित माटी किसान समिति’ का गठन किया. समिति ने जमुई​ जिले के डीएम से मिलकर गांव में जैविक खेती शुरू करने के लिए संसाधनों की मांग की. किसानों की मांग से प्रभावित होकर जिला प्रशासन ने उन्हें पूरा सहयोग दिया. किसानों ने गांव के कचरे और गाय के गोबर और गौमूत्र पर आधारित जैविक खेती शुरू कर दी. इसके बाद किसानों ने केंचुआ खाद से जमीन की उर्वरता बढ़ाई बल्कि गौमूत्र पर आधारित कीटनाशक बनाकर खेती से खरपतवार का नाश और फसल का संरक्षण भी किया.

गोबर गैस का चूल्हा, सोलर लाइट की रोशनी

गांव के किसान और जीवित माटी किसान समिति के सचिव राजकुमार यादव ने लाइव सिटीज से बातचीत करते हुए बताया कि,’ केड़ियाअब पूरी तरह से जैविक खेती पर आधारित गांव बन चुका है. गांव के करीब 100 में से 65 किसान जैविक खेती को अपना चुके हैं. गांव पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त हो चुका है. हर घर में जैविक टॉयलेट हैं, जिससे गंदगी नहीं होती और बाद में मल की खाद बनाकर लोग अपने खेतों में भी इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव वासियों ने अपने घरों को रोशन करने के लिए कम्यूनिटी सोलर बैंक भी बना रखा है. जिसकी वजह से पूरा गांव सौर ऊर्जा से रोशन हो रहा है. गांव में 11 गोबर गैस संयंत्र भी लगे हुए हैं, जिससे हर घर में गोबर गैस से चूल्हा जल रहा है.’

आमदनी रुपया, खर्चा चवन्नी

किसान राजकुमार यादव बताते हैं कि पहले खेती में प्रति एकड़ 800 रुपये कीमत की डीएपी प्रति फसल डालनी पड़ती थी, लेकिन अब सिर्फ 200 रुपये की 50 किलो कंपोस्ट खाद डालने के बाद तीन साल तक कोई खाद इस्तेमाल नहीं करनी पड़ती. किसान फसल चक्र भी अपनाते हैं. साल में एक बार दलहन की खेती जरूर करते हैं. जिसके बाद यूरिया डालने की जरूरत खेत को नहीं पड़ती है. केड़िया में पहले की अपेक्षा इस वक्त तीन गुना अधिक उत्पादन हो रहा है जबकि लागत घटकर चौथाई रह गई है.

देश की तकदीर बदलेगा केडिया मॉडल

किसानों की सफलता के केड़िया मॉडल के बारे में स्वयंसेवी संगठन ग्रीनपीस के सीनियर मीडिया आॅफिसर जितेन्द्र कुुमार बताते हैं कि पहले इस गांव की दशा बेहद खराब थी. लेकिन अब गांव के किसानों ने न सिर्फ खेती को फायदे का धंधा बना दिया है. ग्रीनपीस ने उन्हें प्रशिक्षण दिया और मदद भी दी. जिसके बाद अब देश भर के किसानों को केडिया के किसान खेती करना भी सिखा रहे हैं. गांव के किसानों की सरकार से सिर्फ इतनी मांग है कि उन्हें सिंगल विंडो क्लियरेंस की सुविधा दी जाए. किसान अभी खेत की समस्या के लिए कृषि विकास विभाग के पास भागते हैं तो पानी के लिए जल संसाधन विभाग की तरफ. अगर ये सारी सुविधाएं उन्हें मिल जाएं तो फिर किसानों का केडिया मॉडल पूरे देश के किसानों की तकदीर बदल सकता है.

मिला हर संभव मदद का भरोसा

इसी सिलसिले में गुरुवार को जमुई के बरहट प्रखंड में स्थित केड़िया गांव के किसान ने अपनी मांगों को लेकर कृषि मंत्री राम विचार राय और श्रम संसाधन मंत्री विजय प्रकाश से मिले. इसी क्रम में उन्होंने प्रधान सचिव कृषि आईएएस सुधीर कुमार से भी मुलाकात की है. किसानों ने उनसे मिलकर सरकार के सहयोग के लिए न सिर्फ धन्यवाद दिया बल्कि आगे भी मदद करने का वादा भी लिया. कृषि मंत्री, श्रम संसाधन मंत्री के अलावा आईएएस सुधीर कुमार ने व्यक्तिगत रूप से भी किसानों के लिए हर संभव मदद का भरोसा दिलाया.

मदद के लिए जुटे सेलेब्रिटी भी

केड़िया गांव के किसानों की जरूरतों की मदद के लिए अब देश भर से आवाज उठ रही है. केडिया के किसानों की मदद के लिए सिने स्टॉर वहीदा रहमान, पूजा बेदी और अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने भी हाथ आगे बढ़ाया है. इन लोगों ने क्राउड फंडिंग के जरिए केड़िया के किसानों के लिए आठ लाख रुपये जुटाए हैं. उन्होंने केन्द्र सरकार से अपील भी की है कि वह देश के किसानों को जैविक खेती के फायदे समझाएं ताकि उनकी लागत कम हो और मुनाफा बढ़े.