ट्रिपल तलाक बिल से कहीं गुस्सा है.. तो खिल उठे हैं कई चेहरे भी, क्या चल रहा है ‘क़ौम’ में…

लाइव सिटीज डेस्कः तीन तलाक पर संसद में पास हुए बिल को लेकर मुस्लिम समाज में नाराजगी है तो तीन तलाक से पीड़ित महिलाएं खुश भी हैं. बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस बिल से महिलाओं को न्याय मिलने की बजाय मुसीबत ही बढ़ेगी. बिल में तीन साल की सजा का प्रावधान ठीक नहीं है. सरकार को इसमें संशोधन करना चाहिए. वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं ने इस पर खुशी जताई है.

बिहार का इमारत-ए-शरिया हो या एदार-ए-शरिया सभी इस बिल से खुश नहीं हैं. वहीं तीन तलाक का विरोध करने वाले मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के पूर्व सदस्य एएमयू के विधि विभाग के सेवानिवृत्त प्रो. मोहम्मद शब्बीर का मानना है कि केंद्र सरकार ने कानून बनाते समय सुप्रीम कोर्ट आदेश पर भी गौर नहीं किया. कहा सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक यानि तलाकुल बिद्दत को गैर कानूनी कहा था. सरकार को इस पर कानून बनाना चाहिए था, जो नहीं हुआ. लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल बिना किसी संशोधन के पास, ओवैसी के तीनों अमेंडमेंट खारिज



उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इसका विरोध किया था. कहा कि तलाक सिविल केस है. इसमें सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए. सरकार ने इसे क्रिमिनल बना दिया. मुस्लिम देशों तक में तीन साल की सजा का प्रावधान नहीं हैं. किसी महिला ने पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी तो न तो तलाक ही होगा और न परिवार के फिर से मिलने की गुंजाइश रहेगी. ऐसी स्थिति में महिला का पालन पोषण कहां से होगा? अभी गुंजाइश है कि राज्यसभा में इसमें संशोधन किया जाए.

शहर मुफ्ती खालिद हमीद का मानना है कि कानून में सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए. पति जब जेल चला जाएगा तो पत्नी क्या करेगी? सदियों से ही एक बार में तीन तलाक का विरोध होता आ रहा है, लेकिन यह कानून सही नहीं है.

समाज सेविका मारिया आलम का कहना था कि वह खुद तीन तलाक के खिलाफ हैं, लेकिन कानून ठीक नहीं है. भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं पर आक्रामक रवैया अपनाया है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है. भाजपा की नीयत पर शक है. एक समाज का आदमी तीन तलाक पर जेल होगी वहीं एक समाज का आदमी पत्नी को छोड़ने पर पीएम बनेगा.

एएमयू के मुफ्ती डॉ. जाहिद ने बताया कि कानून मुस्लिम समाज के लिए ठीक नहीं है. इसमें न तो तलाक होगा, न रिश्ता रहेगा. पति जेल चला जाएगा तो पत्नी की तो शादी तक नहीं हो पाएगी. कानून से मसले का समाधान नहीं हुआ, बल्कि दिक्कत और बढ़ गई है. सरकार को जोश में आने की बजाय समझ बूझकर फैसला लेना चाहिए था. कानून में संशोधन होना चाहिए.