नेताओं के दरवाजे हमेशा खुले होने चाहिए, कह रहे हैं अशोक चौधरी

लाइव सिटीज (अशोक चौधरी,बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री) : प्रिय दोस्तों, मैं आज सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ अपनी बात रखना चाहता हूँ . आप सब जानते हैं कि मैं बिहार के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखता हूँ. मेरे पिताजी स्वर्गीय महावीर चौधरी ने कई सालों तक विधायक और मंत्री बनकर राज्य की भरपूर सेवा की है. उनका पूरा राजनीतिक कैरियर बेदाग, निःस्वार्थ और बेहद गरिमामय रहा है. मैंने राजनीति का ककहरा उन्ही से ग्रहण किया है. मैं भले ही एक दलित घराने से संबंध रखता हूँ लेकिन मुझे ये मानने में कोई गुरेज नहीं है कि किसी दूर गाँव में रहने वाले एक आम दलित परिवार के युवक से मुझे ज्यादा अवसर मिले हैं. पहले PM पटेल होते तो कश्मीर पूरा हमारा होता, देश चुका रहा है कांग्रेस के जहर की कीमत

अशोक चौधरी, एक्स एजुकेशन मिनिस्टर (File Pic)

मैंने अवसरों का फायदा भी उठाया और उच्चशिक्षा हासिल की. मैं चाहता तो उच्चशिक्षा हासिल करने के बाद किसी भी क्षेत्र में बढ़िया कैरियर बना सकता था लेकिन मेरा मन, हृदय इसी बिहार में, इसी मिट्टी में रमा रहता था इसलिए मैंने राजनीति को ही जनसेवा का माध्यम समझा और आपलोगों की सेवा में पूरे तन मन और हृदय से जुट गया. राजनीति में निःसंदेह मुझे अपने पिता की बनी निःस्वार्थ छवि का फायदा मिला और जनता की सेवा करने का अवसर भी प्राप्त हुआ.

पिछले कई सालों से मैं राजनीति में खासा सक्रिय हूँ, कई राजनीतिक उठापटक का सामना किया है. सदन की बैठकों से लेकर पार्टी तक की बैठकों में जनसमस्याओं को लेकर हमेशा मुखर रहा हूँ. क्षेत्र से लेकर राज्य के दौरे में मैं हमेशा जनसमस्याओं को नजदीक से देखने और समझने की कोशिश करता रहा हूँ. मुझे जनता के बीच रहना अच्छा लगता है और अक्सर चाहता हूँ कि जनता के दुखदर्द में शामिल होने का कोई मौका नही छोडूं. एक मंत्री के रूप में और एक जनप्रतिनिधि के रूप में मैं हमेशा जनता की समस्याओं को उच्च प्राथमिकता के आधार पर निदान करने की कोशिश करता हूँ.

एक जनप्रतिनिधि के जीवन में कई उतार चढ़ाव भी आते रहते हैं, जैसे कि हम अगर सत्ता में हैं तो हमारे पास मिलने जुलने वालों का तांता लगा रहता है और वही जब एक जनप्रतिनिधि सत्ता से बाहर होता है तो उसे काफी अकेलापन भी महसूस होता है. एक जनप्रतिनिधि को इन सबों में संतुलन बनाकर चलना होता है. इसके अलावा एक ऐसा दबाब होता है जिससे तकरीबन हर जनप्रतिनिधि को दो चार होना पड़ता है, जैसे सत्ता में रहने के दौरान हमारे पास सैंकड़ों ऐसे लोग भी आते हैं जिनका काम हो पाना संभव नहीं होता या कुछ अपरिहार्य कारणों से संभव नहीं होता, उनमें से कई लोग वोटर भी होते हैं, समर्थक भी होते हैं और इनमें से कुछ लोग नकारात्मक प्रचार भी करते हैं.

ऐसे में एक जनप्रतिनिधि को नकारात्मक प्रचार से भी लगातार जूझते हुए भी बेहद सहनशील बने रहना होता है. आमलोगों को भी जनप्रतिनिधियों की इन भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. फिर भी, एक जनप्रतिनिधि के रूप में हमें हमेशा विनम्र होना चाहिए. हमारे दरवाजे हमेशा आमलोगों के लिए खुले होने चाहिए. जनता को कभी ये महसूस नही होना चाहिए कि हमारे और उनके बीच कोई बड़ी दीवार है जो उन्हें हमें अपनी समस्याएं बताने में बाधक बनती है.

(डिस्क्लेमरः अशोक चौधरी ने अपनी बात फेसबुक पर लिखी है. लाइव सिटीज साभार प्रकाशित कर रहा है.)

 

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