तेजप्रताप को भगवान शंकर की वेशभूषा में देख बहुतों की नींद क्यों उड़ रही है ?

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फोटो : पंखुड़ी पाठक के ब्लॉग से

लाइव सिटीज डेस्क : बिहार में राजद चीफ लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और पूर्व हेल्थ मिनिस्टर तेज प्रताप यादव राजनीति से ज्यादा अपने अनोखे अंदाज के लिए चर्चा में रहते हैं. अभी हाल में तेज प्रताप यादव कांवर यात्रा पर निकले थे. उनकी वेशभूषा की काफी चर्चा हो रही है. वह शिव के रूप में थे. विरोधियों ने इस पर निशाना भी साधा है. इस पर समाजवादी पार्टी की स्पोक्स पर्सन पंखुड़ी पाठक जो सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं, उन्होंने तेजप्रताप की इस शिव वेशभूषा पर एक ब्लॉग लिखा है- धर्म का डर क्यूँ ? आप यहां उनका पूरा आर्टिकल उन्हीं के शब्दों में पढ़ें.

हिंदुस्तान सेक्युलर देश है और हम सेक्युलर लोग हैं. हमारी राजनीति हमारी विचारधारा सेक्युलर है. लेकिन धार्मिक कोई सेक्युलर का विपर्याय तो नहीं. सेक्युलर का विपर्याय तो कम्यूनल/साम्प्रदायिक है और जो साम्प्रदायिक है वो सही मायने में धार्मिक नहीं हो सकता. वह तो धर्म से बहुत दूर है. फिर क्यों हम में से कुछ कुछ लोग धर्म के नाम पर खिसियाने लगते हैं ? हाँ मैं समझती हूँ कि धर्म बहुत लोगों के लिए निजी मामला है और हो भी सकता है लेकिन सवाल आ भी जाए तो इतनी असहजता क्यूँ ?

तेज प्रताप की फ़ोटो ने विरोधियों की तो बोलती बंद करी

हाल ही में लालू जी के बड़े सुपुत्र तेज प्रताप की एक फ़ोटो सामने आई जिसमें उन्होंने भगवान शंकर का रूप धारण किया हुआ था. कई धर्म से असहजता मानने वाले सेक्युलर साथी अपना रिएक्शन तय नहीं कर सके. तेज प्रताप की फ़ोटो ने विरोधियों की तो बोलती बंद करी ही लेकिन कुछ धर्म विरोधी राजनीति करने वाले तथाकथित अति-सेक्युलर लोग बहुत हिल गए. ये वही जमात है जो सामाजिक न्याय के नाम पर कई बार सवर्णों के साथ साथ समस्त हिंदू धर्म का भी विरोध करने लगती है. कई बार हिंदू देवी देवता को अपशब्द तक ये लोग बोलते पाए गए हैं. ऐसे में सामाजिक न्याय के पुरोधा लालू के बेटे को भगवान शंकर की वेशभूषा में देख कर इनकी नींदें उड़ गयी.

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क्यों धर्म से इतनी हाय तौबा है?

अब बात बड़ी सरल है. क्या सेक्युलर व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता? तेज प्रताप से मेरी पहली मुलाक़ात में सबसे पहली बात उन्होंने मुझे बताई थी कि वह हर सुबह ‘शिव योग’ करते हैं यानि भोर में भगवान शिव का ध्यान करते हैं. जब उनके घर गयी तो उनके डमरू और त्रिशूल देखे जिनकी वो आराधना करते हैं. साथ में वह एक धर्मनिरपेक्ष युवा संगठन भी चलाते हैं. तो समस्या क्या है? कहाँ उलझन है? क्यूँ उलझन है. क्यूँ धर्म से इतनी हाय तौबा है? धर्म हिन्दुस्तानियों के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है. और हिंदू धर्म तो वैसे भी केवल धर्म नहीं, जीवनशैली है. फिर धर्म से हिचक क्यूँ ?

हिंदुस्तान की यही तो पहचान है

मैं जितने भी समाजवादी नेताओं को जानती हूँ वह धार्मिक हैं, शायद ‘हिंदुत्ववादियों’ से कहीं ज़्यादा. लेकिन धर्म को चार दीवारी में सीमित रखना शायद हमारे यहाँ परम्परा बन गयी है. मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं आ रही, ना ही किसी पर टिप्पणी कर रही हूँ. हम अपनी धर्मिकता को कितना सार्वजनिक करते हैं वह हमारा अपना निर्णय है. लेकिन राजनीति के लिए धर्म से अछूत बनना भी कुछ सही नहीं और फिर सेक्युलर हो कर सार्वजनिक जीवन में धार्मिक होने में जो ख़ूबसूरती है वो और कहाँ है .. आख़िर हिंदुस्तान की यही तो पहचान है !

तेजप्रताप यादव के साथ पंखुड़ी पाठक (File Pic)

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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है

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