गोइठा तो स्‍नैपडील से आ जाएगा, मगर … आम पल्‍लव, केला व अशोक पत्‍ता कहां से आएगा

लाइव सिटीज (मधुरेश) : थैंक्स टू स्नैपडील । एक हेडेक खत्म किया। गोइठा को घर भेज देने का भरोसा दिया। आज सुबह में स्नैपडील पर ‘गोइठा ऑफर’ देख रहा था। कम्पनी ने इसे अपने मेगा दीवाली सेल में रखा है। गोबर से बने 6 गोइठा का फोटो। दाम-189 रुपया। फर्स्ट ऑर्डर पर फ्लैट 50 परसेंट ऑफ है। लिखा है-‘जल्दी कीजिए। ऑफर जल्द खत्म होने वाला है।’ मैंने बहुत जल्दी कर लिया। बुकिंग। मगर …अभी ऐसे ढेर सारे हेडेक बचे हुए हैं-आम का पल्लव, केला व अशोक का पत्ता, दूभ (शुद्ध हरी घास) …, और ऐसी ही बहुत सारी टिपिकल चीजें।

आज छुट्टी के दिन सुबह उठते ही इन सारी चीजों को दोपहर तक इकठ्ठा कर लेने का ऑर्डर पेश हुआ। करना ही है पूरा। हफ्ते भर से घर के कामकाज से पूरी तरह छिटका हुआ था। अब इसे करो । करके दिखाओ। कहां से लाऊं- मंगाऊं, यह सोच ही रहा था कि स्नैपडील ऑफर मेरे इनबॉक्स में टपका। लेकिन, यह या इसके जैसे दूसरे, गोइठा से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

मैंने मान लिया है कि हम, वाकई बहुत आगे बढ़ चुके हैं। पता नहीं, आगे बढ़ने के चक्कर में, क्या-क्या और कितना, पीछे छोड़ दिया? यह, दरअसल कहानी है-जमीन से बेतरतीब कटने की; बड़ी जमात व अर्थव्यवस्था को अभिशप्त कर देने की; और यह बताने की कि जिंदगी, इसकी जरूरतों की सम्पूर्ण पूर्ति, कभी ऑनलाइन हो ही नहीं सकती। अधकचरा विकास यही कराता है। यह सब पांच-सात-दस वर्षों की बात नहीं। हां, आगे के इतने वर्षों के लिए बहुत गंभीर चेतावनी जरूर है।

 Madhuresh Singh
Madhuresh Singh

जब गंवई पटना में बैठा मैं, इन बेहद मामूली चीजों के इंतजाम के बारे में सोचने लग सकता हूं, तब मुंबई-दिल्ली वाले क्या करते होंगे? इसका अगला चरण …? पाले में सिर्फ भयावह कल्पनाएं हैं। खैर, पिछली दीवाली में मुहल्ले के मोड़ पर आम का पल्लव बेचने वाले लड़के से मैंने पूछा कि ‘अरे, यह भी बिकने लगा’, तो वह भी हंसते हुए लजा गया। उसने सिर्फ फूल के पैसे लिए। पल्लव के नहीं। केला और अशोक का पत्ता तो इस बार भी नहीं मिलेगा। मुझे पूरा ध्यान है कि मेरे क्या, मेरे आसपास के मुहल्ले के शायद दो-तीन कैम्पस में ही केला का दो-चार पेड़ है। देंगे? और अशोक …? हां, यह प्लास्टिक वाले शेप में जरूर मिल जाता है।

आपको, अपने आसपास दूभ कहीं दिखेगा, तो बताइएगा। ऐसा नहीं कि यह नौबत सिर्फ दीवाली में आती है। अभी जिउतिया में मैं झिगनी के पत्ता के लिए तबाह हुआ। 20 रुपया में 10 ले आया। अंततः पता चला कि वह नेनुआ (घीउरा) का पत्ता था। कई दिन तक सुनना पड़ा कि ‘मुझे झिगनी और नेनुआ में फर्क नहीं मालूम है।’ ऐसी ही कुछ परेशानी पोय का साग लेने में भी हुई थी।

हां, इधर हम शहर वालों के लिए एक अच्छी बात जरूर हुई है। तीज, जिउतिया या ऐसे मौकों पर जरूरत की टिपिकल चीजें (मरुआ का आटा, कुसी केराव, नोनी का साग आदि), बहुत जगहों पर एकसाथ-पैकेज्ड स्वरूप में मिलने लगा है। वरना …! एक और अच्छी बात …। सरकार, गंगा को राजधानी पटना के किनारे तो नहीं ला सकी। हां, उसने मुहल्ले में बने तलाबों में गंगाजल डालने की बात कही है। देखिये, यह काम भी ठीक से हो पाता है कि नहीं। अलग बात है कि मुहल्ले के गड्ढे या घर की छत पर अर्घ्य देने के लिए बनवाए गए पानी के हौज में लोग खुद ही गंगाजल डाल देते हैं।

बहरहाल, हैप्पी दीपावली। मस्त रहिए। चमकते रहिए। भले यह चमक ‘एज मिरेकल क्रीम’ की क्यों न हो।

( नोट : मधुरेश बिहार के सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं . यह आलेख मधुरेश के फेसबुक वाल से साभार प्रकाशित किया जा रहा है . )

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