1986 की राह पर चल पड़ा गोरखालैंड आंदोलन, अब तक 150 करोड़ की संपत्ति बर्बाद

किशनगंज (अमित झा) : भाषा विवाद से उत्पन्न हुआ पहाड़ पर आंदोलन वर्ष 1986 की राह पर चल पड़ा है. 19 दिनों से उग्र हुआ गोरखालैंड आंदोलन में अब तक 150 करोड़ से अधिक की सरकारी संपत्ति जला दी गई है. चाय उद्योग और पर्यटन उद्योग पूरी तरह तबाह हो चुके हैं.

वर्ष 1986 में अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर गोरखा मुक्ति मोर्चा के नेता सुभाष घिसिंग के नेतृत्व हुए उग्र आंदोलन में 1500 से अधिक लोगों की जानें गई थीं. 1988 में त्रिपक्षीय समझौता के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद की स्थापना की गई थी. फिर वर्ष 2007 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेताओं ने गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलन की शुरुआत की. हिंसा, बंद और आंदोलन के बीच वर्ष 2011 में गोरखालैंड सेसोटिरीयल की स्थापना की गई. इसके चीफ विमल गुरूंग निर्वाचित हुए.

पिछले पांच वर्षों से बंगाल सरकार व गोजमुमो के बीच लगातार तकरार चलती रही है. गोरखालैंड को लेकर 11 जून को एक बार फिर आरंभ हुए आंदोलन में जीटीए की प्रतियां जलाते हुए आंदोलनकारियों ने इसे खारिज कर दिया. विमल गुरूंग सहित 47 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया. वहीं वर्ष 2009 से लोग बीजेपी सांसद इसी आशा से चुनते आ रहे है कि उनकी वर्षों पुरानी गोरखालैंड की मांग पूरी हो सके.

देखें तो तीन दशक के बाद चौथी बार अलग गोरखालैंड राज्य की बात उठी है. पर्वतीय क्षेत्र 19 दिनों से बंद, हिंसा और आंदोलन की आग में जल रहा है. लगभग दो सप्ताह से इंटरनेट सेवा यहां ठप पड़ी हुई है. स्कूल, होटल और प्रमुख पर्यटन स्थलों पर सन्नाटा छाया हुआ है. शुरुआती हिंसा और उग्र आंदोलन के बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आंदोलनकारियों ने अब लोकतांत्रिक आंदोलन की राह पकड़ ली है. लेकिन, मोर्चा के बढ़ते आंदोलन के रूख के साथ स्थानीय लोगों की बढती भागीदारी और राज्य सरकार के तेवर को देखते हुए कहा जा सकता है कि न अलग गोरखालैंड की राह आसान है और न ही शांति बहाली की कोई आस दिख रही है.

दरअसल यह आंदोलन 1986 की राह पकड़ चुका है. जिस तरह 1986 में सुभाष घिंसिग के नेतृत्व में अलग गोरखालैंड के लिए हिसंक आंदोलन आरंभ हुआ था तथा पश्चिम बंगाल में तत्कालीन ज्योति बसु की सरकार के अड़ियल रवैये के कारण देखते-देखते इस आंदोलन में 1500 लोगों की जानें चली गई थीं. इस बार यह आंदोलन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरूंग के नेतृत्व में शुरू हुआ है. आंदोलन इतना उग्र हो गया है कि 19 दिनों से दार्जलिंग बंद ही नहीं है, बल्कि हिंसा और आंदोलन की आग में जल रही है.

खास बात कि गोरखालैंड का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए रामबाण का काम करता है. यही वजह है कि समय समय पर यह क्षेत्र में छाया रहता है. लेकिन इस बार यह आंदोलन जोर पकड़ लिया है. इसी मुद्दे पर सुभाष घिसिंग कई वर्षों तक दार्जिलिंग में अपना एक क्षत्र राज कायम करते हुए केन्द्र और राज्य सरकार को अपनी अंगुली पर नचाते रहे थे. अब इसी मुद्दे को उनके ही चेले विमल गुरूंग ने नये तरीके से उठाया है. इस संबंध में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रमुख विमल गुरूंग ने लाइव सिटीज को बताया कि उन्हें राज्य सरकार पर विश्ववास नहीं है. तीन गोरखा वीरों की मौत की जांच सीबीआई करे. सीआईडी की जांच पर उन्हें भरोसा नहीं है. गोरखालैंड जब तक नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. यह आंदोलन प्रत्येक पहाड़वासियों का है.

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